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शनिवार, 31 अगस्त 2019

मेरी नज़्म... संध्या शर्मा

 ख़यालों के पंख लगाकर
ख़्वाबों की उड़ान भरकर
कितनी भी दूर क्यों न चली जाए
लेकिन लौट आती है "मेरी नज़्म"
उतर आती है ज़मी पर
मेरे साथ नंगे पाँव घूमती है
पत्ता-पत्ता, डाल-डाल, बूटा -बूटा
इसलिए तो तरोताज़ा रहती है
जब कभी यादों के सात समंदर पार करके
थककर निढाल हो जाती है
तो बैठ जाती हैं मेरे साथ
साहिल की ठंडी रेत पर
जाने क्या लिखती - मिटाती
बड़ी शिद्द्त और ख़ामोशी से
देखती रहती है.....
ख्वाहिशों की तरह
लहरों का आना
और पत्थरों से चोट खाकर
बार-बार लौट जाना...

सोमवार, 28 अप्रैल 2014

इतिहास लिख दो...


हमारे नाम ज़िन्दगी  हर सांस लिख दो,                      
रड़क रही जो सीने में वो फ़ांस लिख दो।

 मंज़िल जो हमसे अभी दूर बहुत दूर है,
ख्वाबों में मंज़िल का अहसास लिख दो।

गुंचा-ए-गुल खिला अबके इस गुलशन में,
राहे सफ़र में अपना हर ख्वाब लिख दो।

नज़्म,  ग़ज़ल, अफ़सानों की रवायत है,
वक्त भी पढे जिसे कुछ खास लिख दो।

कान में चुपके से सरसराती हवा ने कहा,                                      
इस घने अँधेरे में तुम उजास लिख दो।

याद रखे सदियों तक ये जमीं आसमां,
चलो कलम उठाओ इतिहास लिख दो।