ख़यालों के पंख लगाकर
ख़्वाबों की उड़ान भरकर
कितनी भी दूर क्यों न चली जाए
लेकिन लौट आती है "मेरी नज़्म"
उतर आती है ज़मी पर
मेरे साथ नंगे पाँव घूमती है
पत्ता-पत्ता, डाल-डाल, बूटा -बूटा
इसलिए तो तरोताज़ा रहती है
जब कभी यादों के सात समंदर पार करके
थककर निढाल हो जाती है
तो बैठ जाती हैं मेरे साथ
साहिल की ठंडी रेत पर
जाने क्या लिखती - मिटाती
बड़ी शिद्द्त और ख़ामोशी से
देखती रहती है.....
ख्वाहिशों की तरह
लहरों का आना
और पत्थरों से चोट खाकर
बार-बार लौट जाना...
ख़्वाबों की उड़ान भरकर
कितनी भी दूर क्यों न चली जाए
लेकिन लौट आती है "मेरी नज़्म"
उतर आती है ज़मी पर
मेरे साथ नंगे पाँव घूमती है
पत्ता-पत्ता, डाल-डाल, बूटा -बूटा
इसलिए तो तरोताज़ा रहती है
जब कभी यादों के सात समंदर पार करके
थककर निढाल हो जाती है
तो बैठ जाती हैं मेरे साथ
साहिल की ठंडी रेत पर
जाने क्या लिखती - मिटाती
बड़ी शिद्द्त और ख़ामोशी से
देखती रहती है.....
ख्वाहिशों की तरह
लहरों का आना
और पत्थरों से चोट खाकर
बार-बार लौट जाना...