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सोमवार, 28 अप्रैल 2014

इतिहास लिख दो...


हमारे नाम ज़िन्दगी  हर सांस लिख दो,                      
रड़क रही जो सीने में वो फ़ांस लिख दो।

 मंज़िल जो हमसे अभी दूर बहुत दूर है,
ख्वाबों में मंज़िल का अहसास लिख दो।

गुंचा-ए-गुल खिला अबके इस गुलशन में,
राहे सफ़र में अपना हर ख्वाब लिख दो।

नज़्म,  ग़ज़ल, अफ़सानों की रवायत है,
वक्त भी पढे जिसे कुछ खास लिख दो।

कान में चुपके से सरसराती हवा ने कहा,                                      
इस घने अँधेरे में तुम उजास लिख दो।

याद रखे सदियों तक ये जमीं आसमां,
चलो कलम उठाओ इतिहास लिख दो।