शनिवार, 1 मार्च 2014

अन्नदाता की पुकार ....

"इश्क, मोहब्बत, व्यापार हो या हो कोई सरकार  
पेट में जब तक पड़े न रोटी, सब कुछ है बेकार!!!"

असमय बारिश
आंधी तूफ़ान
रूठ गया क्यों
इनसे भगवान
जस का तस
इनका दर्द
बढ़ता जाता
क़र्ज़ का मर्ज़
गीली आखें
पोंछ रहा
चुपचाप खड़ा
देख रहा
पानी में मिलते
खून पसीने से सिंचे
खेत - खलिहान
हलाकान- परेशान
कोई है जो सुने.... ?
धरती का कर्ज चुकाते
कृषि-प्रधान देश के
इन किसानो की
दु:ख-भरी दास्तान ...!!!

9 टिप्‍पणियां:

  1. दर्द भरी रचना..... ! सच हमारे किसान की हालत बहुत ही दयनीय हैं ...

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  2. आपकी इस प्रस्तुति को शनि अमावस्या और ब्लॉग बुलेटिन में शामिल किया गया है। कृपया एक बार आकर हमारा मान ज़रूर बढ़ाएं,,, सादर .... आभार।।

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  3. शानदार प्रस्तुति. से साक्षात्कार हुआ । मेरे नए पोस्ट
    "सपनों की भी उम्र होती है " (Dreams havel life) पर आपकी प्रतिक्रिया अपेक्षित है।

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  4. किसानो कि सच्चाई कहती बहुत ही संवेदनशील रचना..

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  5. किसानों की तो नियति यही है, वर्षा आधारित खेती एक जुआ है, जो कभी मालामाल कर देता है तो कभी कंगाल …… आपने बहुत अच्छा शब्द चित्र खींचा है।

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