मंगलवार, 11 मार्च 2014

स्मृतियाँ

यही है वह एकांत
वही पेड़ और शाखाएं
स्मृतियों की छायाएँ
यहीं से उगा था
चाँद प्रीत का
यहीं मिले थे पहली बार
ठीक उसी जगह जा पहुंचे
जो जगहें जानी पहचानी थी
हमारा स्वागत नहीं करतीं
फिर क्यों आ जाते हैं यहाँ
बार-बार  ………!!


शायद कोई फ़ागुनी  बयार                                          
उतार फेंके पातों के पीले पर्दे
सूनी डालों पर हरियाए
कुछ अपनापन
अलसाई दुपहरी में                   
बौरा उठे इनका भी मन                    
इन सूनी घडि़यों में
मन की बनकर धड़कन                                
देखो एक कली कुलबुलाई
सेमल के अरुण कपोलों पर
वासंती लाली छाई..........

9 टिप्‍पणियां:

  1. बस ये लाली यूँ ही छायी रहे..

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  2. कोमल भावों से गुंथी पंक्तियाँ..

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  3. सूनी डालों पर हरियाए
    कुछ अपनापन
    ................. अनुपम भाव संयोजन

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  4. बहुत सुन्दर प्रस्तुति...!
    --
    आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल बुधवार (12-03-2014) को मिली-भगत मीडिया की, बगुला-भगत प्रसन्न : चर्चा मंच-1549 पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  5. वाह , खूबसूरत अभिव्यक्ति है !!

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  6. आपकी खासियत यह है दीदी कि आप भावनाओं को व्यक्त करने वाले शब्द ढूंढ लाती हैं

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  7. सुभानाल्लाह ...... बेहतरीन रचना

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