सोमवार, 24 फ़रवरी 2014

छोटी सी अभिलाषा...


तुम .....
प्रकृति की अनुपम रचना
तुम्हारा विराट अस्तित्व
समाया है मेरे मन में
और मैं .....
रहना चाहती हूँ हरपल
रजनीगंधा से उठती
भीनी-भीनी महक सी
तुम्हारे चितवन में
चाहती हूँ सिर्फ इतना
कि मेरा हर सुख हो
तुम्हारी स्मृतियों में
और दुःख ........
केवल विस्मृतियों में................!

18 टिप्‍पणियां:

  1. सुख हमारे और दुःख मेरे …
    गहन प्रेम की भावना !

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  2. इसीलिये तो प्रेम सुन्दर है....
    बहुत सुन्दर....
    सस्नेह
    अनु

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  3. अहा!अहा!अहा!.. सुन्दर है भीनी-भीनी महक..

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  4. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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  5. सुन्दर भाव लिए सुन्दर अभिव्यक्ति..

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  6. बहुत ही अर्थपूर्ण ... सुख की स्मृतियाँ ही रहें जीवन में बस ... दुःख का नाम नहीं ...

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  7. बेहतरीन अभिवयक्ति.....बहुत ही अर्थपूर्ण

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  8. बहुत गहन सार्थक अभिव्यक्ति...बहुत सुन्दर...

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  9. आपकी इस प्रस्तुति को आज की बुलेटिन सर डॉन ब्रैडमैन और ब्लॉग बुलेटिन में शामिल किया गया है। कृपया एक बार आकर हमारा मान ज़रूर बढ़ाएं,,, सादर .... आभार।।

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  10. http://nivedita-srivastava.blogspot.in/2014/03/blog-post.html

    अपने ब्लाग "संकलन" में आपकी रचना सहेजी है ..... धन्यवाद !

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