गुरुवार, 7 जून 2012

सरोकार ...संध्या शर्मा

हम कोई पंछी नहीं
जो फुदकते रहे
डाल-डाल पर
चहकते फिरें
हर मुंडेर पर
चंद दानो के लिए

हम धर्मराज नहीं
जो फंस जाये
चक्रव्यूह में
और प्रतीक्षा करे
अभिमन्यु की
व्यूह भेदन के लिए 

हम कोई चारण नहीं 
जाएँ राजसभा में
गाएं विरदावली
ढोल बजाते हुए
किसी की शान में
तनिक कृपा के लिए


हम तो पत्थर हैं
उस नींव का
जो हिला दे
एक ही पल में
पूरी मंजिल को
अधिकार के लिए

24 टिप्‍पणियां:

  1. हम तो पत्थर हैं
    उस नींव का
    जो हिला दे
    एक ही पल में
    पूरी मंजिल को
    अधिकार के लिए
    ..............बड़ी गहरी बात कह दी आज आपने अपनी रचना में ! बहुत ही सशक्त एवं सार्थक प्रस्तुति !

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  2. सुंदर सार्थक सशक्त अभिव्यक्ति ,,,,,

    MY RESENT POST,,,,,काव्यान्जलि ...: स्वागत गीत,,,,,

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  3. वाह!अपनी पहचान .....
    शुभकामनाएँ!

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  4. बहुत बढ़िया.............
    खुद पर यकीन हो तो क्या मुश्किल है...............

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  5. पत्थर के साथ हम चिड़िया भी हैं - छू लें आसमां पंखों पे भरोसा करके , सुनाएँ मधुर गीत , वृक्षों के संगी साथी बन जाएँ

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  6. bahut gahari baaat likhi hai aapne
    antim panktiyon ne to kamal hi kar diya hai
    bahut bahut badhai
    poonam

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  7. बहुत ही सशक्त एवं सार्थक प्रस्तुति !

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  8. बहुत ही बेहतरीन और सार्थक रचना...
    हम तो पत्थर हैं
    उस नींव का
    जो हिला दे
    एक ही पल में
    पूरी मंजिल को
    अधिकार के लिए
    बेहतरीन पंक्तिया...

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  9. हम तो पत्थर हैं
    उस नींव का
    जो हिला दे
    एक ही पल में
    पूरी मंजिल को
    अधिकार के लिए
    आत्मविश्वास से लबरेज रचना ....!

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  10. वाह! खूबसूरत, एक अलग तेवर एक नया अंदाज़, आधुनिक भारतीय नारी का.

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  11. हम तो पत्थर हैं
    उस नींव का
    जो हिला दे
    एक ही पल में
    पूरी मंजिल को
    अधिकार के लिए

    बहुत ही बेहतरीन और सार्थक रचना

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  12. वजूद का सुखद एहसास कराती बढ़िया कविता।

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  13. हम तो पत्थर हैं
    उस नींव का
    जो हिला दे
    एक ही पल में
    पूरी मंजिल को
    अधिकार के लिए

    सशक्त रचना. सुंदर अभिव्यक्ति.

    बधाई इस प्रस्तुति के लिये.

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  14. बहुत खूब ... नीव बन के जीना ही असल जीवन है ... बहुत ही गहरी और प्रभावी रचना ..

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  15. हम तो पत्थर हैं
    उस नींव का
    जो हिला दे
    एक ही पल में
    पूरी मंजिल को
    अधिकार के लिए...waah sandhya jee bahut accha likha hai....

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  16. हम तो पत्थर हैं
    उस नींव का
    जो हिला दे
    एक ही पल में
    पूरी मंजिल को
    अधिकार के लिए

    बहुत खूब! बहुत सुन्दर और प्रभावी प्रस्तुति....

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