रविवार, 15 जनवरी 2012

देख लूँ जरा.... संध्या शर्मा


विषयुक्त वातावरण में,
अमृत कलश खोज लूँ जरा.

क्षण के इस जीवन का मंथन कर,
दो घूंट अमृत के पी लूँ जरा.

शब्दों में समेट दूँ साँसों को,
गीतों में संवेदना भर लूँ जरा.

दुःख के अंधियारे आसमान में,
  ध्रुवतारा अमन का ढूंढ़ लूँ जरा.

प्रश्नों और समाधानों का,
सत्यान्वेषण कर लूँ जरा.

जीवन - मृत्यु के पावन संगम पर,
खुद को अनासक्त कर दूँ जरा.

जीवन मरण दोनों घाट अनोखे,
हर घाट के ठाठ देख लूँ जरा...    

23 टिप्‍पणियां:

  1. जीवन के पावन संगम पर,
    खुद को हवन कर दूँ जरा.

    सही फैसला...

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  2. जरा जरा जुडकर ही समग्र को पा लिया जाता है . बहुत सुन्दर शब्दों से सजी सुन्दर रचना..

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  3. बंजारे के लिए दोनो घाट बराबर
    यति के लिए दोनो ठाठ बराबर
    यह जीवन हो समरस यदि तो
    इसकी उसकी यहाँ बाट बराबर......।

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  4. जीवन मरण दोनों घाट अनोखे,
    हर घाट के ठाठ देख लूँ जरा... tabhi to yatraa puri hoti hai

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  5. सुन्दर शब्दों से सजी सुन्दर रचना.

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  6. बेहतरीन भाव ... बहुत सुंदर रचना प्रभावशाली प्रस्तुति

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  7. जीवन मरण दोनों घाट अनोखे,
    हर घाट के ठाठ देख लूँ जरा... सत्य से रु-ब-रु करवाती सार्थक प्रस्तुति।

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  8. बहुत सुन्‍दर शब्‍दशिल्‍पी हैं आप.

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  9. जीवन - मृत्यु के पावन संगम पर,
    खुद को अनासक्त कर दूँ जरा.

    जीवन में इस पड़ाव को पाना "सत्य" से दोस्ती कर लेना है , लेकिन व्यक्ति है कि मृत्यु शैया पर भी अपनी इच्छाओं को नहीं त्यक्त कर पाता....जीवन के प्रति अनासक्ति और ईश्वर के प्रति आसक्ति जीवन को निश्चित रूप से उसके वास्तविक मंतव्य तक पाहुंचा देती है ..... !

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  10. बहुत सुंदर शब्दों से सजी रचना .....बढ़िया पोस्ट
    new post--काव्यान्जलि --हमदर्द-

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  11. विषयुक्त वातावरण में,
    अमृत कलश खोज लूँ जरा

    सुन्दर शब्द , सुन्दर रचना

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  12. जीवन मरण दोनों घाट अनोखे,
    हर घाट के ठाठ देख लूँ जरा...

    सुन्दर अभिव्यक्ति

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  13. सुंदर रचना।
    गहरी अभिव्‍यक्ति।

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  14. जीवन मरण दोनों घाट अनोखे,
    हर घाट के ठाठ देख लूँ जरा...

    बहुत गहन भाव ! आभार!

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  15. सुन्दर शब्दों में गहरे अर्थ लिए शानदार पोस्ट|

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  16. बहुत सुंदर प्रस्तुति । मेरे नए पोस्ट " हो जाते हैं क्यूं आद्र नयन पर ": पर आपका बेसब्री से इंतजार रहेगा । धन्यवाद। .

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  17. खुद को अनासक्त कर दूँ जरा.
    जीवन मरण दोनों घाट अनोखे,
    हर घाट के ठाठ देख लूँ जरा...
    आज तो आपने पूरा जीवन दर्शन ही समझा दिया . मनुष्य जान बूझकर भी अनजान बना रहता है . गंभीर बातो को शब्दों में ढाल दिया है आपने .

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  18. //शब्दों में समेट दूँ साँसों को,
    गीतों में संवेदना भर लूँ जरा.

    bahut sundar.. :)

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