रविवार, 22 फ़रवरी 2015

अपनो छोटो सो घरगूला.....

हिराने अंगना 
बिसरे चूल्हा
कहाँ डरे अब
बरा पे झूला
भूले चकिया
सूपा, फुकनी
नहीं दिखे ढिग
छुई की चिकनी
ओझल भये
गेरू के फूल
गाँव गलिन की 
गुईयाँ संगे 
सजा लओ 
सबने अपनों 
छोटो सो घरगूला.....

6 टिप्‍पणियां:

  1. वाह कितनी मधुर स्मृतियों क याद किया है ... अब कहाँ यह सब ....

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  2. सुन्दर सशक्त अभिव्यक्ति

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  3. घरघूला स्थाई नहीं होता। जब मन आया उजाड़ दिया जब मन आया बना लिया। घर में स्थायित्व का बोध होता है। अर्थात खेल-खेल में बनाया हुआ घर। सुंदर भाव।

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  4. वाह , मंगलकामनाएं आपको !

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