शाम अभी ढली नही सुबह अभी हुई नही आओ करें इंतज़ार गुनगुनी सी धूप में ठंडी-ठंडी बयार का ढलती हुई शाम का धुंधली सी सुबह का रूठी सी चांदनी में खोये से चाँद का फूलों के मौसम में झूमती बहार का...
यार, यह कविता पढ़कर मन एकदम हल्का हो गया। लगता है जैसे हम उसी गुनगुनी धूप में बैठे हों, ठंडी बयार को महसूस कर रहे हों और समय की धीमी चाल का आनंद ले रहे हों। सुबह और शाम के बीच का वह मज़ा, चांदनी में खो जाने का अहसास और फूलों की खुशबू में बहार का झूमना, सबकुछ इतने प्यारे और सरल शब्दों में बयान किया है कि खुद को वहीं महसूस करने को मन करता है।
ये इंतज़ार तो सभी को है ... तभी जीवन है ...
जवाब देंहटाएंबिना इंतज़ार के जीवन अधूरा है |
जवाब देंहटाएंउम्दा रचना संध्या जी |
आशा
अच्छा लगता है ऐसा इंतज़ार....जिसका फल सदा मीठा हो!!!
जवाब देंहटाएंबहुत सुन्दर कविता.
सस्नेह
अनु
बहुत ही सुन्दर और प्यारी रचना...
जवाब देंहटाएं:-)
मधुर सी रचना
जवाब देंहटाएंलाजवाब इंतजार..
जवाब देंहटाएंसुन्दर इंतज़ार
जवाब देंहटाएंbahut hi sunder
जवाब देंहटाएंसुंदर ...भावपूर्ण
जवाब देंहटाएंइस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.
जवाब देंहटाएंसुन्दर रचना |
जवाब देंहटाएंबहुत सुन्दर और भावपूर्ण....
जवाब देंहटाएंयार, यह कविता पढ़कर मन एकदम हल्का हो गया। लगता है जैसे हम उसी गुनगुनी धूप में बैठे हों, ठंडी बयार को महसूस कर रहे हों और समय की धीमी चाल का आनंद ले रहे हों। सुबह और शाम के बीच का वह मज़ा, चांदनी में खो जाने का अहसास और फूलों की खुशबू में बहार का झूमना, सबकुछ इतने प्यारे और सरल शब्दों में बयान किया है कि खुद को वहीं महसूस करने को मन करता है।
जवाब देंहटाएं