शुक्रवार, 29 नवंबर 2013

दर्द...!!!


भरोसे के छल में लिपटे 
जितने तीर थे
वक़्त के तरकश में
सारे के सारे
छोड़े जा चुके
वज़ूद की पीठ पर
छलनी हो चुके
तार-तार हो चुके
भोले-भाले वज़ूद को
इतनी आदत सी हो गई है
इन छली तीरों की
यदि दर्द ना मिले
तो दर्द होता है
ऐसा लगता है
जैसे ये जख्म नहीं रहे
दवा हो गए हों...

10 टिप्‍पणियां:

  1. जैसे ये जख्म नहीं रहे
    दवा हो गए हों...ऐसा भी हो जाता है कभी - कभी
    भावमय करते शब्‍द

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  2. वक़्त के तरकश में भरोसे के छल से लिपटे जितने तीर थे सब छोड़े जा चुके हैं।
    अब जिन्‍दगी की खुशियों में दर्द नही मिलते तो लगता है जिन्‍दगी कुछ नहीं है

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  3. मर्मस्पर्शी.... दर्द स्वयं दवा हो जाता है समय के साथ

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  4. वक्त के साथ मिलते दर्द कि ऐसी आदत हो जाती है
    कि दर्द फिर दर्द नहीं लगता..
    भावपूर्ण उत्कृष्ठ रचना...

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  5. दर्द न मिले तो दर्द होता है ………… वाह ! बहुत खूब |

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  6. क्या कहना ..जब वे दवा ही हो गये...

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  7. बहुत उम्दा भावपूर्ण प्रस्तुति...बहुत बहुत बधाई...
    नयी पोस्ट@ग़ज़ल-जा रहा है जिधर बेखबर आदमी

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