रविवार, 20 अक्तूबर 2013

एक प्रश्न....


ईंट - पत्थरों ने
मुझसे एक प्रश्न किया
यही है तुम्हारी जात ?
यही है तुम्हारा धर्म ?
तुम जैसे जीवों से
हम निर्जीव भले?
बिना भेद-भाव के
पड़े रहते हैं राह में
जीवन भर खुद को घिसते
राह पर बिछकर
सबको सहारा देते
अपने ईमान पर अडिग
आज तक खोजती हूँ
उस प्रश्न का उत्तर
शायद मिल जाए कहीं
मिलेगा एक दिन
इसी आशा से....

16 टिप्‍पणियां:

  1. संवेदनहीन समाज में इस प्रश्न का उत्तर मिलना कठिन है,,
    बहुत ही भावपूर्ण रचना...

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  2. उत्तर नहीं मिलते ...फिर भी आशा की किरण जलती ही रहती है ...जीवन की आखिरी साँस तक

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  3. इस जगत के सारे जनमानस ......."बिना भेद-भाव के" "अपने ईमान पर अडिग" " पड़े रहते हैं राह में, जीवन भर खुद को घिसते राह पर बिछकर, सबको सहारा देते" .......इन पंक्तियों पर ध्यान दे अपने स्वयम को परिवर्तित कर लें .....फिर आशा की किरण नहीं, जीवन-ज्योति की सुन्दर लव समूचे जगत को प्रकाशित करेगी......

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  4. मन में उमड़ते भावों का निर्जीव पदार्थ के माध्यम से सजीव चित्रण ...

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  5. इंसान का तन हांड मांस से बना कर पत्थर दिल कर दिया ईश्वर ने......

    सुन्दर भाव..

    सस्नेह
    अनु

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  6. सुंदर और मनोहारी प्रस्तुति

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  7. बहुत ही सुन्दर प्रस्तुती आदरेया।

    एक बात कहना था आपकी प्रस्तुती का लिंक तो अन्य चर्चाकर अपने मंच पर लगा ही रहें है क्या कभी आपने इसका कभी प्रतिकार किया, यदि नही तो फिर आपकी आदेश की पट्टी क्यों चल रही है । उत्कृष्ट रचना को ही चर्चाकर अपने मंच पर लगते है ताकि अन्य लोग भी अधिक से अधिक पढ़ सके आपकी उत्कृष्ट रचना। धृष्टता के लिए क्षमा पार्थी हूँ क्योकि मैं भी चर्चाकर हूँ। rajendra651@gmail.com

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  8. तुम जैसे जीवों से
    हम निर्जीव भले?
    बिना भेद-भाव के
    पड़े रहते हैं राह में
    जीवन भर खुद को घिसते
    राह पर बिछकर
    सबको सहारा देते
    सशक्‍त भाव लिये बेहतरीन अभिव्‍यक्ति

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  9. पता नहीं ओर कहां तक गिरेगा इन्सान ... अर्थपूर्ण रचना ...

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  10. सच कहा इन्सान तो सबसे गया बीता होता जा रहा है |

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