रविवार, 29 मई 2011

क्यों नहीं अपनी हस्ती......... संध्या शर्मा


उसकी इजाज़त के बगैर जब पत्ता भी नहीं हिलता है,
वह ख़ामोशी से दुनिया का तमाशा क्यों देखता है ..
क्या सब कुछ उसकी मर्जी से ही होता है...?
क्यों नहीं अपनी हस्ती आप ही मिटा देता है ...?
ना होते गिरिजाघर, गुरूद्वारे,
ना मस्जिद, ना मंदिर होता.
ना कोई हिन्दू, मुस्लिम,
ना सिक्ख, ईसाई होता.
 ना कोई दुश्मन होता,
ना कोई किसी से नफरत करता.
दिल बनाकर उसमे झूठ और फरेब ना देता,
तो आपस में एक प्यार का रिश्ता ही होता..
हर रूप में इंसान यहाँ इंसान ही होता....

"ज़िन्दगी मर रही है,
मौत यहाँ जिन्दा है....
अपने बनाये जहाँ पर,
तू अब भी नहीं शर्मिंदा है....?"     

45 टिप्‍पणियां:

  1. उसको बहुत जोर की डाट लगा दी है आपने संध्या जी.
    अब तो जरूर सुनना चाहिये उसे.
    लेकिन,उसको ढूंढे कहाँ ?
    आपकी प्रस्तुति लाजबाब है.

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  2. "ज़िन्दगी मर रही है,
    मौत यहाँ जिन्दा है....
    अपने बनाये जहाँ पर,
    तू अब भी नहीं शर्मिंदा है....?"

    बेहतरीन पंक्तियाँ हैं.
    वो तो एक परीक्षक और कक्ष निरीक्षक है जो इंसान बनाकर हमारी हमारी परीक्षा ले रहा है .परीक्षा कक्ष में हम सही लिखें या गलत कक्ष निरीक्षक हमें नहीं टोकता लेकिन अंतिम परिणाम हमें बता देते हैं कि जो हमने किया वो सही था या गलत था.शायद इसीलिए वो बस देख रहा है.

    सादर

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  3. "ज़िन्दगी मर रही है,
    मौत यहाँ जिन्दा है....
    अपने बनाये जहाँ पर,
    तू अब भी नहीं शर्मिंदा है....?"

    सटीक प्रश्न उठाया है आपने संध्या जी.

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  4. आपकी रचनात्मक ,खूबसूरत और भावमयी
    प्रस्तुति भी कल के चर्चा मंच का आकर्षण बनी है
    कल (30-5-2011) के चर्चा मंच पर अपनी पोस्ट
    देखियेगा और अपने विचारों से चर्चामंच पर आकर
    अवगत कराइयेगा और हमारा हौसला बढाइयेगा।

    http://charchamanch.blogspot.com/

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  5. मन के आक्रोश को सही शब्द दिए हैं

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  6. bilkul sahi kaha aapane
    lekin sab insaan ka kara dhara hain
    bhagwn moke deta hain sudharne ke bas insaan un isharo ko samjhe

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  7. मुर्ती घड़ी पाषाण की,किया सिरजनहार।
    दादू सांच सूझे नहीं, यों डूबे संसार॥

    ईश्वर ने जब संसार में भेजा तो बंधन रहित था
    धरती पर आते ही असंख्य बंधनों में बंध गया।
    अपने-अपने कबीले-कुनबे हो गए,उनमें ढल गया।
    सारी अच्छाईयों को भूल गया,बुराईयों से छल गया।

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  8. uski marzi ke bagair kuch nahi hota to kyun amrit manthan me wah asuron se ladaa ... use bhi ladna padta hai hawaon ko sahi disha dene ke liye

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  9. संध्या जी ! इतना भी ना नाराज हों उस परमात्मा पर, इसमें उसकी कोई भी गलती नहीं है, हमें तो उसका आभार मानना चाहिए की उसने गलत सही का निर्णय करने के लिए हमें बुद्धि दी है | गलती तो हम इंसानों की है की बुद्धि होते हुवे भी बिना बुद्धि के हम काम करते है तथा परिणाम स्वरुप बाद में दुःख उठाते है तथा उसका हवाला देकर अपने को अलग अलग फिरकों में बाँट लेते हैं |. वेदों में कहीं नहीं लिखा की तू हिन्दू बन तु मुस्लिम बन उसमे तो यही लिखा है की " मनुर्भवः " तू मनुष्य बन !!
    वाह...किन शब्दों में इस अप्रतिम रचना की प्रशंशा करूँ...बेजोड़..
    मेरी हार्दिक शुभ कामनाएं आपके साथ हैं !

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  10. वैसे तो आपका ब्लॉग ही कमाल का है, पर जब भी नया कुछ मिलता है काफ्फी बढ़िया लगता है !

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  11. बहुत सुंदर भाव और अभिव्यक्ति....

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  12. यशवन्त जी की बातों से पुरी तरह सहमत।

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  13. I guess god made our earth the most beautiful planet in the universe... but its our selfishness and endless desires which is resulting in timeline like KALYUG.
    Nice post !!

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  14. ज़िन्दगी मर रही है,
    मौत यहाँ जिन्दा है....
    अपने बनाये जहाँ पर,
    तू अब भी नहीं शर्मिंदा है....?"

    प्रभावित करती पंक्तियाँ..... मन को उद्वेलित करता प्रश्न लिए

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  15. अपने बनाये जहाँ पर,
    तू अब भी नहीं शर्मिंदा है....?"

    अगर ऐसा होता तो आज यह हालात नहीं होते .....बहुत गहरे भावों से ओत प्रोत पंक्तियाँ ......आपका आभार

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  16. ज़िन्दगी मर रही है,
    मौत यहाँ जिन्दा है....
    अपने बनाये जहाँ पर,
    तू अब भी नहीं शर्मिंदा है.

    बहुत सुंदर कविता,
    - विवेक जैन vivj2000.blogspot.com

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  17. aakroshit man ke bhaavon ko ujagar karti rachna.bahut achchi lagi.charcha manch ke maadhyam se aapko padh rahi hoon.apne blog par bhi aane ke liye aamantrit kar rahi hoon.sabhaar.

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  18. "ज़िन्दगी मर रही है,
    मौत यहाँ जिन्दा है....
    अपने बनाये जहाँ पर,
    तू अब भी नहीं शर्मिंदा है....?"

    आक्रोश को अभिव्यक्त करना भी जरूरी है. ये कविता उसी प्रमाण है. बहुत सुंदर.

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  19. बहुत ही खूब ! अच्छा लगा पढ़ कर ..
    मेरे ब्लॉग पर भी आपका स्वागत है : Blind Devotion

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  20. जिंदगी मर रही है

    मौत यहाँ जिंदा है

    अपने बनाए जहां पर

    तू अब भी नहीं शर्मिन्दा है ?

    ........................एक रचनाकार ने महारचनाकार से प्रश्न किया है

    ...................भावुक ह्रदय की आकुल अभिव्यक्ति .......सार्थक रचना

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  21. इतनी आक्रोश से भरी कविता इस बात का प्रमाण है कि इंसान कि इंसानियत सारी हदें पार कर चुकी है!
    प्रभावपूर्ण अभिव्यक्ति के लिए आभार !

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  22. "ज़िन्दगी मर रही है,
    मौत यहाँ जिन्दा है....
    अपने बनाये जहाँ पर,
    तू अब भी नहीं शर्मिंदा है....?"

    बहुत सटीक प्रश्न...आज इंसानियत शर्मसार हो रही है, लेकिन ईश्वर भी मौन है..बहुत सुन्दर प्रस्तुति..

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  23. ज़िन्दगी मर रही है,
    मौत यहाँ जिन्दा है....
    अपने बनाये जहाँ पर,
    तू अब भी नहीं शर्मिंदा है....?"

    nahin usane hi banaya hai aisa jahan aur vah neeche ka tamash dekh kar khud khush hota hai aur phir kahata hai ki har jeev men main hoon aur khud apani hi hatya karva kar sharmindda kaisa hona?
    vaah re vidhata!

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  24. ज़िन्दगी मर रही है,
    मौत यहाँ जिन्दा है....
    अपने बनाये जहाँ पर,
    तू अब भी नहीं शर्मिंदा है....?
    sateek bat kahi hai aapne .aabhar

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  25. Mam... maine aapke blog ko award ke liye choose kia h...come and check out www.impactofthoughts.blogspot.com

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  26. .....आप सभी का बहुत बहुत धन्यवाद....
    आपने ब्लॉग पर आकार जो प्रोत्साहन दिया है उसके लिए आप सभी की ह्रदय से आभारी हूँ .....

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  27. Nice blog mam... You are a housewife still you find time for such quality writing.. you deserve an applause!!!

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  28. "ज़िन्दगी मर रही है,
    मौत यहाँ जिन्दा है....
    अपने बनाये जहाँ पर,
    तू अब भी नहीं शर्मिंदा है....?"

    बहुत सुन्दर प्रस्तुति,मन को उद्वेलित करती पंक्तियाँ

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  29. I have tagged you in my meme..come check it out
    http://impactofthoughts.blogspot.com/2011/06/writing-is-not-like-box-of-chocolates.html

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  30. ज़िन्दगी मर रही है,
    मौत यहाँ जिन्दा है....
    अपने बनाये जहाँ पर,
    तू अब भी नहीं शर्मिंदा है....
    दिल को छू लेने वाली पंक्तियाँ , बधाई

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  31. "ज़िन्दगी मर रही है,
    मौत यहाँ जिन्दा है....
    अपने बनाये जहाँ पर,
    तू अब भी नहीं शर्मिंदा है....?"
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    aapne to jhakjhor ke rakh diya
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  32. क्या बात है, जिंदगी मर रही है और मौत यहां जिंदा है। बहुत बहुत बधाई

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  33. आज आपकी कविता दुबारा पढी, सचमुच जीवन के सच को आपके बडी खूबसूरती से उद्घाटित किया है। एक बार फिर सेबधाई स्‍वीकारें।

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  34. इंसान कि इंसानियत सारी हदें पार कर चुकी है!
    आपकी प्रस्तुति लाजबाब है........संध्या जी

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  35. गहरे जज्बातों को शब्द दे देती हैं आप .... बहुत लाजवाब
    कुछ व्यक्तिगत कारणों से पिछले 15 दिनों से ब्लॉग से दूर था
    इसी कारण ब्लॉग पर नहीं आ सका !

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  36. Mam lajwab parstuti ke liye dhanywad. . .
    Jai hind jai bharat

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  37. सुन्दर ,मनोहर ,अनुकरणीय .आभार .

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  38. "ज़िन्दगी मर रही है,
    मौत यहाँ जिन्दा है....
    अपने बनाये जहाँ पर,
    तू अब भी नहीं शर्मिंदा है....?"

    sateek sawal
    par ishwar se kyun?
    us insaan se kyun nahi jisne khuda ki khudayi ko deemak laga di hai nafrat ki??

    achchha likha hai aapne

    abhar

    Naaz

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  39. अपने बनाये जहाँ पर,
    तू अब भी नहीं शर्मिंदा है....?"

    सटीक प्रश्न उठाया है आपने संध्या जी.

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