शनिवार, 5 मार्च 2011

"देहाभिमान"

इस  मायावी संसार में 
मनुष्य भौतिक सुखों की चाह 
और
बंधन मुक्ति की कामना करता है
भौतिक सुख और 
आत्मिक शांति के द्वंदों के बीच
फंसे इंसान को 
मौत से डर लगता है
इस उधेड़ बुन में 
वह भूल जाता है, स्वयं.....
अपने अस्तित्व को
कि वह शरीर नहीं !
आत्मा है...
मन और बुद्धि
जिस पर इन्सान इतराता है
भूलकर अपने मूल को
वह आत्मा से अलग नहीं
मन और बुद्धि...
यह योग्यता है आत्मा की
और उसे रहता हमेशा देह का भान
अर्थात "देहाभिमान" 
                                   संध्या शर्मा 


18 टिप्‍पणियां:

  1. अच्‍छी सीख देती रचना।
    बधाई हो आपको।
    शुभकामनाएं।

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  2. सुंदर रचना ....आखिरी पंक्तियाँ कमाल की हैं....

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  3. सत्यम ,शिवम ,सुन्दरम .
    आत्मा का 'सत्-चित-आनन्द' स्वरुप यदि ध्यान करे और यह भाव मन में दृढ हो जाये तो फिर मृत्यु का भय कैसा .
    आप मेरी पोस्ट 'मुद् मंगलमय संत समाजू' पर भी आकर मुझे अनुग्रहित करें.आप जैसे संत आत्मा से ब्लॉग जगत धन्य है.

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  4. कल्पना संग आध्यात्मिकता की उंची उडान...
    उत्तम प्रस्तुति.

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  5. जीवन क्षणिक है , यह तो सब जानते हैं, लेकिन जीवन का आत्मिक पक्ष जिसे हम आत्मा कहते हैं यह परमात्मा का अंश होने के कारण अमर है ....आपकी कविता इंसान को उसके जीवन का मर्म समझाते हुए उसे जीवन जीने की प्रेरणा देती है ..इस सार्थक रचना के लिए आपको हार्दिक बधाई

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  6. सार्थक रचना .. जो हैं उसको पहचानना जरूरी है ...
    बहुत अछा लिखा है ...

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  7. देहाभिमान को छोडना इतना आसान कहाँ है, यही देह तो मेरी पहचान है, इसी देह से तो संवेदनाएं गुजरती हैं रही मन और आत्मा की बात् तो उसके लिए खुद के भीतर की यात्रा करनी होगी. काश यह दुनिया वो लम्हा दे दे जिसमें देह को भुला आत्मा के स्पंदनों से बातें हो सके. अच्छी प्रस्तुति, ऐसा बहुत कुछ सोचने के लिए बाध्य कर देती है आपकी कविता.

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  8. बहुत गहरी भावार्थ वाली रचना है ... सुन्दर शब्द और जीवन की सीख देने वाली अति सुन्दर कृति

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  9. पहले तो हमने आत्‍मा का गीत गाया और फि‍र कहा
    "देहाभि‍मान को जी लो कुछ क्षण मरने से पहले"

    देह के अभि‍मान को जी लें... इसका क्‍या तात्‍पर्य है??

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  10. चर्चा मंच के साप्ताहिक काव्य मंच पर आपकी प्रस्तुति मंगलवार 08-03 - 2011
    को ली गयी है ..नीचे दिए लिंक पर कृपया अपनी प्रतिक्रिया दे कर अपने सुझावों से अवगत कराएँ ...शुक्रिया ..

    http://charchamanch.uchcharan.com/

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  11. गहन चिंतन...सुन्दर प्रेरक रचना..

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  12. आद. संध्या जी,
    आपकी कविता जीवन की पीड़ा से मुक्त होकर जीने का मार्ग प्रशस्त करती है !
    आत्म बोध कराती है यह कविता !
    सुन्दर अभिव्यक्ति के लिए आभार !

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  13. बेहतरीन पोस्ट.
    महिला दिवस की हार्दिक शुभकामनायें

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  14. सहमत हूँ मरने से पहले कुछ क्षण जी लेना चाहिए| अच्छी रचना धन्यवाद

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  15. ..सोने से पहले एक पल का जगना, मरने से पहले जीने की राह में उठाया गया कदम हो सकता है।

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  16. pal bhar ko soche insan ko is soch ke daur tak to lati hain lekin fir jindgi ki aapa-dhapi me sab dhundhla pad jata hai. acchhi seekh deti abhivyakti.

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  17. आत्मा के सच्चे सवरूप की जिसने पहचान कर ली उसे परमात्म प्राप्ति में देर नहीं लगती.गीता ज्ञान से ओत प्रोत
    आपकी संत रचना को नमन.

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  18. संध्या जी,
    सुन्दर अभिव्यक्ति के लिए आभार !

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