सोमवार, 14 मार्च 2011

"कल अपनी भी बारी है" ........ संध्या शर्मा



धरे रह गए साधन सारे,
नाकाम तकनीकें सारी हैं.

क्यों रोना अब देख तबाही,
जब खुद ही की तैयारी है. 


कुदरत के कानून के आगे,
क्या औकात हमारी है.

ऋषि मुनियों की तपोस्थली,
ये भारतभूमि न्यारी है.

शायद उनका पुण्यप्रताप ही,
अपने कर्मों पर भारी है.

थमा नहीं ये कहर देख लो,
वह तो अब भी जारी है.

संभल सको तो संभलो वर्ना,
कल अपनी भी बारी है...

हाँ कल अपनी भी बारी है.....  

22 टिप्‍पणियां:

  1. कविता सच बोल रही है, पुरखों के पुण्य-प्रताप का ही असर है।

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  2. बहुत लाजवाब ... कुदरत के सामने सब गौण हैं ... आपने सही लिखा है .....

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  3. "वक़्त की हर शै गुलाम, वक़्त का हर शै पैगाम"
    जी हाँ ,"कल अपनी भी बारी है. "
    कबीरा गर्व न कीजिये,काल गहे कर केश
    ना जाने कित मारिह,का घर का परदेश.
    जिस वक़्त भी समझ आ जाये,संभलने की कोशिश करते रहना चाहिए.
    शानदार ,प्रेरक पोस्ट,बहुत बहुत आभार.

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  4. संध्या जी,
    कुदरत के कानून के आगे,
    क्या औकात हमारी है.

    आपकी हर पंक्ति सोचने पर विवश करती है! अगर हम अभी भी नहीं जागे तो हमारे पास अपनी पीढ़ियों को सौपने के लिए कुछ भी नहीं बचेगा !

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  5. संध्या जी,
    नमस्कार !
    आपने सही लिखा है प्रेरक पोस्ट,बहुत बहुत आभार.

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  6. कविता का शीर्षक ही अपने आप में बहुत कुछ कह जाता है...
    कल अपनी ही बारी है...
    वाह..

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  7. कई दिनों व्यस्त होने के कारण ब्लॉग पर नहीं आ सका

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  8. बहुत सही कहा है..प्रकृति के साथ छेड़छाड़ का परिणाम एक दिन भुगतना ही होता है..बहुत सार्थक रचना..

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  9. चर्चा मंच के साप्ताहिक काव्य मंच पर आपकी प्रस्तुति मंगलवार 15 -03 - 2011
    को ली गयी है ..नीचे दिए लिंक पर कृपया अपनी प्रतिक्रिया दे कर अपने सुझावों से अवगत कराएँ ...शुक्रिया ..

    http://charchamanch.uchcharan.com/

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  10. जीवन क्षणभंगुर है ...पर हम इस बात को सोचते कहाँ है , अगर हम इन बातों को सोचते तो हम प्रकृति का अंधाधुंध उपयोग न करते ...आपकी कविता में इस भाव की गहन अभिव्यक्ति हुई है ...आपका आभार

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  11. 'संभल सको तो संभलो वर्ना
    कल अपनी ही बारी है .......'

    सत्य वचन

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  12. बहुत अच्छा लिखा है आपने... ...जापान के लोगों के लिए हार्दिक संवेदनाएं....

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  13. प्रकृति से खिलवाड करने वालों को चेतावनी देती सुंदर रचना।
    शुभकामनाएं आपको।
    सच कहा आपने, कल अपनी ही बारी है....।

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  14. सही कहा ...
    प्रकृति का कहर कब किस पर टूटे ...!

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  15. sac me kudarat ke kaanoon ke aage insaan kee koI aukaat nahee bhale hee kitani taraki kar le. achhee rachanaa ke liye badhai.

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  16. संध्या जी
    नमस्कार
    आपका मेल मुझे मिला था। आज पहली बार आपकी रचनाओं को पढ़ रहा हुॅ। बेहद ही खुबसुरती से आप अपनी सोच को कलमबद्ध करती है। मैनें आपकी ब्लाग को फॉलों कर लिया है। वक्त मिले तो कभी हमारे ब्लाग पर भी नजर अवश्य डालियेगा। आभार।

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  17. सच कहा आपने, कल अपनी ही बारी है|धन्यवाद|

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  18. हाँ सही कहा है आपने .... वास्तव में हमे जापान में हुआ यह विध्वंस एक सबक की तरह लेना होगा .......... सुन्दर और सशक्त कविता के लिए बधाई

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  19. आदरणीय संध्या दीदी
    प्रकृति से खिलवाड करने वालों को चेतावनी देती सुंदर रचना।
    प्रकृति का कहर कब किस पर टूटे पता नहीं

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