शनिवार, 26 फ़रवरी 2011

हाय!!! महंगाई ..... 


हाय हाय महंगाई..
महंगाई - महंगाई
न जाने कहाँ से आई.

बेबस शासन इसके आगे,
ये किसी के समझ न आई.

करते थे दाल-रोटी से गुज़ारा,
अब वो भी नसीब नहीं भाई.

सब नकली हर जगह मिलावट,
नीयत में भी खोट है समाई.

हाहाकार मचा दी तूने ,
कैसे गूंजेगी शहनाई.

दिन दूनी आबाद हो रही,
तू क्या जाने पीर पराई.

करूणा दया ने तोडा नाता,
अब तो जान पर बन आई.

नींद उड़ा दी जनता की,
और खुद लेती अंगड़ाई.

आग लगा कर जनजीवन में,
तुझे जरा भी शर्म न आई.

जगती आशा देख बजट से,
हौले से मुस्काई.

खुदा कहाँ तू , बचा ले अब तो,
तेरी कैसी है ये खुदाई.

हाय हाय महंगाई..
महंगाई - महंगाई
न जाने कहाँ से आई.......
संध्या शर्मा  



  

23 टिप्‍पणियां:

  1. सच में महंगाई , आज सब जगह समाई ,
    बहुत अच्छी रचना

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  2. सच मे सब मंहगाई के मारे ही हैं। सुन्दर रचना। बधाई।

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  3. बहुत ही सुन्दर रचना.
    महंगाई ने मार डाला है.
    सलाम.

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  4. सभी महंगाई के मारे हुए हैं..बहुत सुन्दर रचना

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  5. सही है ...आज के हालत में सटीक बैठती रचना

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  6. बहुत सुन्दर विचार युक्त कविता है |

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  7. सबको महंगाई ने मार डाला है ..सुन्दर सटीक प्रस्तुति

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  8. संध्या जी
    आपके लेखन ने इसे जानदार और शानदार बना दिया है....

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  9. संध्या जी ,
    वाकई महंगाई ने सभी को त्रस्त करके रखा हुआ है.आपके भावुक हृदय तक को नहीं छोड़ा. पर क्या करे सभी मजबूर से दिखलाई पड़ते
    हैं इस के आगे .कहते है गाने-रोने से कुछ दर्द हल्का हो जाता है ,तो फिर यह ही सही.अति सुंदर प्रस्तुति .
    आप मेरे ब्लॉग 'मनसा वाचा कर्मणा ' पर आये ,अच्छा लगा.आते रहिएगा और अपने बहुमूल्य विचारों से अवगत कराते रहिएगा .धन्यवाद .

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  10. Hi Sandhya...thanks for dropping by my blog. Loved you poetry , so well said about mehengai...
    I have tried hindi poetry on my other blog....yours' is a nice rhyming poetry...

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  11. संध्या जी ,

    'हाय हाय मँहगाई' बहुत बढ़िया लगी |

    सरल सहज ढंग से आपने महँगाई के प्रकोप का बहुत वास्तविक और जीवंत चित्रण किया है |

    अति सुन्दर !

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  12. बहुत सुन्दर सटीक प्रस्तुति| धन्यवाद|

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  13. महंगाई को भी आपने लय प्रदान कर दी। बहुत ख़ूब....

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  14. इस वर्ष के बजट पर यह कविता सटीक बैठती है ...आपकी रचनात्मकता हमारे लिए उपयोगी है ...समाज को नयी दिशा देने में सक्षम

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  15. Sandhya ji, samyochit vishay par aapke sarthak vichar bahut bhaaye...Mangayee to sursa ke munh saman badhti jaa rahi...iski mar nirali,subah bharo purse aur shaam me khaali....

    Umda Soch aur umda rachna...

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  16. अरे दोस्त अगर महंगाई को इतने सुर और ताल में सजाओगी तो ये जाने का नाम ही नहीं लेगी तभी हम सोच रहे थे ये बार - बार निखर - निखर वापस क्यु आ जा रही है |
    बहुत खुबसूरत रचना |

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  17. मंहगाई ने तो मार ही डाला.

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  18. बहुत बढ़िया संध्या जी ! मँहगाई की चक्की में पिसते आम इंसान की पीड़ा को बड़ी सशक्त अभिव्यक्ति दी है ! आनंद आ गया !

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