रविवार, 14 अगस्त 2016

आज़ादी....!



एक बात कहूँ..?
खरीदोगे तो
अपमान करोगे
सड़कों पर फेंकोगे
न खरीदोगे तो
नन्हे मज़दूरों का
साल भर का 
इन्तज़ार व्यर्थ
चलो मान लिया
तुम मना लोगे 
इनके बनाए हुए
झंडे बिना आज़ादी
क्या है कोई हल...?
जो पूरा कर दे इनके
छोटे - छोटे सपने
जो दिला सके इन्हें
भूख और गरीबी से
आज़ादी....!

8 टिप्‍पणियां:

  1. सच्ची आज़ादी तो तभी आणि मानी जायगी ... गहरी बात है इन पंक्तियों में ...

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  2. कब मिलेगी सच्छी आजादी यक्ष प्रश्न है यह?

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  3. सच कहूँ तो हम झंडा खरीदते हैं, लहराते हैं, फिर अगले दिन सड़क पर पड़े देखते हैं और चुप रह जाते हैं। इससे बड़ा अपमान क्या होगा उस नन्हे मज़दूर के लिए जिसने उम्मीद से वो झंडा बनाया था? मुझे सबसे ज़्यादा चुभी ये बात कि उनके लिए आज़ादी अभी भी सिर्फ़ सपना है। भूख और गरीबी से जूझते बच्चों की मेहनत का सम्मान करना ही असली देशभक्ति है।

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