शुक्रवार, 22 अप्रैल 2011

लम्बी प्रतीक्षा...........! संध्या शर्मा

फिर बनेगा कोई नया राजा,  
फिर होगा राजतिलक...
फिर सजेंगे चौराहे,
निकलेंगे लम्बे जुलूस...
गूंजेंगे स्वागत गान,
होगी फूलों की बरसात...
अभिमान से ऊंचे होंगे,
मस्तक चापलूसों के...
और कुचल दिए जायेंगे,
असहमति के सर,
विजयी जुलूस तले...
किसानो ने की आत्महत्या,
कितने मरे भूख से,
कौन हुआ घायल,
भ्रष्टाचार की तलवार से...
बदल गया कुंठा में,
कितनो का आत्मविश्वास...
सारे के सारे प्रश्न,
खड़े होंगे चुपचाप...
हाथ बांधे,
निरीह सी आँखों में,
अनसुलझे से सवाल लिए,
एक जवाब की,
लम्बी प्रतीक्षा में....
 

40 टिप्‍पणियां:

  1. क्या यह सब मजबूरी है संध्याजी, क्या कोई निदान नहीं इस परिस्तिथी
    का. आपके भाव आंदोलित करते हैं.

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  2. यही स्थिति है आम आदमी की. कोउ हो नृप हमें का होई ?

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  3. संध्या जी, इन समस्याओं और सवालों के हल सिर्फ आम जनता के जागरूक होने से ही मिल सकते हैं... बहुत ही उत्तेजक भाव हैं आपकी रचना में... शुभकामनायें!

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  4. आपकी उम्दा प्रस्तुति कल शनिवार (23.04.2011) को "चर्चा मंच" पर प्रस्तुत की गयी है।आप आये और आकर अपने विचारों से हमे अवगत कराये......"ॐ साई राम" at http://charchamanch.blogspot.com/
    चर्चाकार:-Er. सत्यम शिवम (शनिवासरीय चर्चा)

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  5. सारे के सारे प्रश्न,
    खड़े होंगे चुपचाप...
    हाथ बांधे,
    निरीह सी आँखों में,
    अनसुलझे से सवाल लिए,
    एक जवाब की,
    लम्बी प्रतीक्षा में....


    और इस प्रतीक्षा में व्यक्ति जीवन को यूँ ही बिता देता है .....लेकिन सवाल पीढ़ी दर पीढ़ी यूँ ही बने रहते हैं ..मानसिक उलझन को सामने लती रचना एक सार्थक हल की तलाश में ...आपका आभार

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  6. आज के परिप्रेक्ष्य में शानदार रचना। आभार।

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  7. सारे के सारे प्रश्न,
    खड़े होंगे चुपचाप...
    हाथ बांधे,
    निरीह सी आँखों में,
    अनसुलझे से सवाल लिए,
    एक जवाब की,
    लम्बी प्रतीक्षा में...

    सटीक और प्रासंगिक प्रस्तुति ... न जाने यह प्रतीक्षा कितनी लम्बी होगी..... सुंदर सार्थक रचना संध्या जी

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  8. हाथ बांधे,
    निरीह सी आँखों में,
    अनसुलझे से सवाल लिए,
    एक जवाब की,
    लम्बी प्रतीक्षा में...
    सवाल पीढ़ी दर पीढ़ी यूँ ही बने रहते हैं
    सटीक प्रस्तुति .........संध्या जी

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  9. संध्या जी
    तारीफ़ करनी पडेगी एक ही रचना में इतने सारे सार्थक सवाल ......आभार !

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  10. फिर बनेगा कोई नया राजा,
    फिर होगा राजतिलक...
    फिर सजेंगे चौराहे,
    निकलेंगे लम्बे जुलूस...
    गूंजेंगे स्वागत गान,
    होगी फूलों की बरसात...
    अभिमान से ऊंचे होंगे,
    मस्तक चापलूसों के...


    यथार्थ का शब्दशः चित्रण है आपकी कविता में ....
    बहुत सुन्दर सकारात्मक अभिव्यक्ति ...
    हार्दिक बधाई !

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  11. बेहद प्रभावशाली और सोचने को विवश करती रचना।

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  12. यथार्थ का सटीक चित्रण है आपकी कविता में .

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  13. एक आश्वासन के चक्र में एक ख्वाब की दौड़ के चक्र में फंसे इंसान की सच्चाई को बतलाती कविता, चुभते तेवर वाली कविता.

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  14. आज के परिप्रेक्ष्य में शानदार रचना। आभार।

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  15. लम्बी प्रतीक्षा का दंश जाने कब तक सहना पड़ेगा!
    सफल अभिव्यक्ति।

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  16. बढ़िया प्रस्तुति ....शुभकामनायें आपको !

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  17. यथार्थ का सही चित्रण है है आपकी प्रस्तुति में और भावों का उदेव्लन भी. सुंदर रचना. अभिनन्दन.

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  18. बहुत समसामयिक और सटीक प्रस्तुति...बहुत सुन्दर

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  19. मौजूदा दौर की परिस्थितियों को चित्रित करती रचना।
    अच्‍छे शब्‍द संयोजन।
    शुभकामनाएं आपको।

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  20. अज की राजनिती का सजीव चित्रण। बहुत अच्छी लगी अपकी रचना। बधाई।

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  21. बेहतरीन अभिव्यक्ति, सामयिक रचना के लिए आभार !

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  22. यथार्थ का प्रभावशाली चित्रण ...
    ज़मीन से जुडी रचना ....बहुत अच्छी

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  23. शासन की कोई भी व्यवस्था हो... पिसना तो जनता को ही पड़ता है... एक प्रभावशाली चित्रण...

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  24. आपकी ये पोस्ट बहुत कुछ समझाती है.

    दुनाली पर देखें
    चलने की ख्वाहिश...

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  25. बहुत सटीक और सुन्दर रचना

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  26. वर्तमान परिपेक्ष्य में आप की यह कविता बेहद ही सटीक है और अज की राजनिती के द्वन्द को बेहद ही खूबसूरती से प्रकट कर रही है.
    मेरी ओर से आपको हार्दिक शुभ कामनाएं

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  27. आप की बहुत अच्छी प्रस्तुति. के लिए आपका बहुत बहुत आभार आपको ......... अनेकानेक शुभकामनायें.
    मेरे ब्लॉग पर आने एवं अपना बहुमूल्य कमेन्ट देने के लिए धन्यवाद , ऐसे ही आशीर्वाद देते रहें
    दिनेश पारीक
    http://kuchtumkahokuchmekahu.blogspot.com/
    http://vangaydinesh.blogspot.com/2011/04/blog-post_26.html

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  28. Mam india ki halat na jane kab sudhre. . . Pta nahi kab wo parsuram janm lega jo in bhrstachariyon ka ant krega? . . . . . . . . . Jai hind jai bharat

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