मंगलवार, 19 फ़रवरी 2013

पगडंडी खुशियों की... संध्या शर्मा

राह न मिली
खुशियों की
तो क्या/ देखो न
ये पगडंडियाँ भी
वहीँ तक जाती हैं
चुन लेंगे कोई एक
सोंधी सोंधी
माटी की खुश्बू 
से महकती
नन्ही-नन्ही
झाड़ियों से भरी
पगडंडी
गुनगुनाते हुए कोई
प्यारा सा
भूला बिसरा गीत
बढ़ते कदम
पहुँच ही जायेंगे
खुशियों तक
पगडंडी ही
कल का
महामार्ग है
.......

मंगलवार, 12 फ़रवरी 2013

रंग बासंती …… संध्या शर्मा


महुआ महके टेसू दहके, बौराए आमों के बौर,
पीली-पीली सरसों फूली, कनेर फ़ूले हैं चहुं ओर.

सुमनों के अधरों पर फ़ाग, भ्रमरों के भी डेरे हैं,
कलियों के मनभाए हैं, सुगंधी के आवारा चोर.

बासंती वसुधा का वैभव, श्रृंगार है न्यारा न्यारा,
बहने लगी बयार बासंती, दुल्हन सी नई नकोर.

कुसुम फ़ूले हैं सपनों से, कचनार की छांव में,
सेमल भी सुर्ख हुआ है, जब हुई आज की भोर.

चलो सजना हम भी झूलें, बैठ प्रेम हिंडोले में.
चले आकाश के पार, जहां मिले  न कोई छोर.

नेह सांवरिया पाए धरती, झूम के झूमे अंबर, 
छाया रंग बसंती, मन पर चले ना कोई जोर.

शनिवार, 9 फ़रवरी 2013

मोड़.... संध्या शर्मा

सुना है नहीं रहेगा
गली के कोने का
बिजली का खंभा
जिससे टिककर खड़ी
अपलक निहारती थी माँ
ससुराल जाते हुए मुझे
जब तक गली का
मोड़ ना आ जाए
मैं अब भी देखती हूँ उसे
हर बार आते वक़्त
तब तक.....
जब तक!!
मोड़ ना आ जाये
जबकि अब माँ
उससे टिकी नहीं होती
आज जाने मुझे
क्यों ऐसा लग रहा है
जैसे मुझसे मेरा कोई
अपना बिछड़ रहा है
कितने खुश हैं लोग
रास्ते का...!
चौड़ीकरण हो रहा है....

बुधवार, 6 फ़रवरी 2013

अतीत में जीना बुरा होता है... संध्या शर्मा

पारदर्शी लक्ष्मण रेखा  
विरासत में मिली
जो रोक देती 

मेरे तुम तक
बढ़ते कदम
मेरे पाँव मुझसे
नज़दीकियों की
मांग करते 

जिसकी तलाश में
गुजरते रात -दिन
गुम कर दिया
मैंने अपना पता
अपने हाथों से
इसी दुनिया में रहते 

नई दुनिया तराश डाली
अब मेरे मन के
दो पाँव हो गए 

एक पाँव....
अतीत का साथ देता है
दूजा कहता है....
अतीत में जीना बुरा होता है....