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सोमवार, 4 अगस्त 2014
मंगलवार, 19 फ़रवरी 2013
बुधवार, 2 जनवरी 2013
मुक्ति... संध्या शर्मा
हर उस बंधन से
जो बुने थे
सिर्फ और सिर्फ मैंने
शायद उसमे
ना तुम बंध सके
ना मैं बाँध सकी
निकल जाना है
अलग राह पर
लेकर अपने
सपनो की गठरी
जिसे सौपना था तुम्हे
खोलना था बैठकर
तुम्हारे सामने
लेकिन अब नहीं...!
क्योंकि जानती हूँ
गठरी खुलते ही
बिखर जायेंगे
मेरे सारे सपने
कैसे समेटूंगी भला
दोबारा इनको
और हाँ...!
इतनी सामर्थ्य नहीं मुझमे
कि समेट सकूँ इन्हें
इसीलिए ...
कसकर बांध दिया है
मैंने उन गाठों को
जो ढीली पड़ गईं थी
मुझसे अनजाने में
अच्छा अब चलती हूँ
अकेले जीना चाहती हूँ
बची - खुची साँसों को
हो सकता है...?
तुम्हे मुक्त करके
मैं भी मुक्ति पा जाऊं....
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