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सोमवार, 4 अगस्त 2014

सहचर रास्ते ...

पथ से बिना डिगे 
हर स्थिति
हर तकलीफ से
जूझते हुए हर रात
तारों के साथ
बतियाती हूँ/बिताती हूँ
रात कटती है
हर पल
राह बनाते 

नए ख्वाब बुनते 
हर सुबह चलती हूँ
उन राहों पर
साथ उजालों के
क्योंकि...
मंज़िल तो ठहराव है

और रास्ते 
सदा साथ होते हैं
अनवरत 

साये की तरह
सहचर बन कर
जीवनपर्यंत...


मंगलवार, 19 फ़रवरी 2013

पगडंडी खुशियों की... संध्या शर्मा

राह न मिली
खुशियों की
तो क्या/ देखो न
ये पगडंडियाँ भी
वहीँ तक जाती हैं
चुन लेंगे कोई एक
सोंधी सोंधी
माटी की खुश्बू 
से महकती
नन्ही-नन्ही
झाड़ियों से भरी
पगडंडी
गुनगुनाते हुए कोई
प्यारा सा
भूला बिसरा गीत
बढ़ते कदम
पहुँच ही जायेंगे
खुशियों तक
पगडंडी ही
कल का
महामार्ग है
.......

बुधवार, 2 जनवरी 2013

मुक्ति... संध्या शर्मा

मुक्त करती हूँ तुम्हे 
हर उस बंधन से 
जो बुने थे 
सिर्फ और सिर्फ मैंने 
शायद उसमे 
ना तुम बंध सके 
ना मैं बाँध सकी 
निकल जाना है  
अलग राह पर 
लेकर अपने 
सपनो की गठरी 
जिसे सौपना था तुम्हे 
खोलना था बैठकर 
तुम्हारे सामने 
लेकिन अब नहीं...!
क्योंकि जानती हूँ 
गठरी खुलते ही 
बिखर जायेंगे 
मेरे सारे सपने 
कैसे समेटूंगी भला 
दोबारा इनको 
और हाँ...! 
इतनी सामर्थ्य नहीं मुझमे 
कि समेट सकूँ इन्हें 
इसीलिए ...
कसकर बांध दिया है 
मैंने उन गाठों को 
जो ढीली पड़ गईं थी
मुझसे अनजाने में 
अच्छा अब चलती हूँ 
अकेले जीना चाहती हूँ 
बची - खुची साँसों को 
हो सकता है...?
तुम्हे मुक्त करके 
मैं भी मुक्ति पा जाऊं....