बुधवार, 16 जुलाई 2025

एक ख़त बीते लम्हों के नाम... संध्या शर्मा

एक ख़त लिखना चाहती हूँ मैं,  

उन गुजरे पलों के नाम,  

जो छू गए थे मन को कभी

और खो गए थे वक़्त के अंधेरों में।


काग़ज़ पे उतर आएँगे,

कुछ धुंधले से चेहरे,

हँसती आँखें, अधूरे ख़्वाब

और वो बिखरी चुप्पियाँ।  


हर शब्द होगा एक दर्द,

हर पंक्ति एक सिसकी,

मगर ये ख़त पढ़ेगा कौन?  

वक़्त तो बहरा है...!


भेजूँगी नहीं इसे कहीं मैं,

रख दूँगी दिल की किसी कोठरी में,

जहाँ गूँजती रहेगी हर पंक्ति

एक अनसुनी कहानी की तरह।  

12 टिप्‍पणियां:

  1. गूँज रही है हर पंक्ति
    सुन्दर रचना

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  2. बहुत सुंदर अभिव्यक्ति।
    सादर।
    ------
    जी नमस्ते,
    आपकी लिखी रचना शुक्रवार १८ जुलाई २०२५ के लिए साझा की गयी है
    पांच लिंकों का आनंद पर...
    आप भी सादर आमंत्रित हैं।
    सादर
    धन्यवाद।

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  3. हर शब्द होगा एक दर्द,

    हर पंक्ति एक सिसकी,

    मगर ये ख़त पढ़ेगा कौन?

    वक़्त तो बहरा है...!
    बहुत सटीक एवं लाजवाब
    वाह!!

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  4. बहुत ख़ूब, कितना कुछ दिल में धरा ही तो रह जाता है

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  5. क्या बात है, सच में, ऐसा लगा जैसे किसी भूले हुए कोने में रखी यादों की डायरी खोल ली हो। ये जो चुप्पियाँ हैं न, इनकी भी अपनी आवाज़ होती है, और आपने उन्हें बहुत खूबसूरती से लिख डाला। ये ख़त भले न भेजे कोई, लेकिन दिल के कोने में हमेशा ज़िंदा रहेगा। ऐसा लिखना हर किसी के बस की बात नहीं होती।

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