सोमवार, 7 दिसंबर 2015

समझ...

इस ब्रह्माण्ड की 
दसों दिशाओं ने
शस्य स्यामला धरा की
मुस्काती फिजाओं ने
महकती हवाओं ने
झूमती लताओं ने
बल-खाती नदियों ने
कल-कल बहते झरनों ने
माटी के धोरों ने
कर्मठ शूरवीरो ने
मिट्टी के कण कण ने
स्वदेश के जन जन ने
कह दी अमर कहानी
सब गर्वित हैं मातृभूमि पर
सिवाय उनके ....
जो बैठे रहे सिर्फ ढोंग रचाकर
न खुद समझ सके 'देशप्रेम'
न किसीको समझा पाए...

8 टिप्‍पणियां:

  1. यस्य नास्ति स्वयं प्रज्ञा शास्त्रं तस्य करोति किम्।
    लोचनाभ्याम विहिनस्य दर्पणा: किम करिष्यति॥

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  2. आपकी यह उत्कृष्ट प्रस्तुति कल शुक्रवार (11.12.2015) को " लक्ष्य ही जीवन का प्राण है" (चर्चा -2187) पर लिंक की गयी है कृपया पधारे। वहाँ आपका स्वागत है, सादर धन्यबाद।

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  3. देश पे जो गर्व नहीं कर सकता जिसको प्रेम नहीं देश से उसका जीवन ही व्यर्थ है ...

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