शनिवार, 13 दिसंबर 2014

सम्मोहन ...

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अनंत सागर के
खारे पानी में
अकेली खड़ी वह 
हर क्षण धीरे-धीरे  
घुलती जा रही है 
सांसें रुकने को हैं, 
जैसे-जैसे डूबती है 
सागर की लहरों में
विश्वास और ढृढ़ होता
गहरे खींचता है उसे 
अभिमानी, उद्दंड
पर उसकी भी जिद्द है
जीत कर ही मानेगी
सागर की विशालता
जितना डराती हैं
उतना ही उसकी ओर 
खिंची चली जाती है 
उद्दात लहरें 
आवाज़ देती हैं उसे 
हर बार बहा ले जाती हैं 
बहुत कुछ उसका 
सब लाना है वापस उसे 
वह अच्छी तरह जानती है
यह प्रलय नही है 
सिर्फ सम्मोहन है 
कुछ-कुछ मृत्यु जैसा

8 टिप्‍पणियां:

  1. खारे पानी में मिलकर गंगा का जल भी खारा हो जाता है।

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  2. इस सम्मोहन से जीतने की क्षमता है उसमें ... जो खो गया उसे पाना जरूरी है ..
    गहरे भाव लिए रचना ...

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  3. मोहक है यह सम्मोहन...जिसके पार ही जीवन है

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  4. कौन बाहर आना चाहेगा इस सम्मोहन से...लाज़वाब गहन अभिव्यक्ति...

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  5. जीतने की जिद का सुन्दर सम्मोहन ..अति सुन्दर..

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  6. सुन्दर प्रस्तुति। मेरे नए पोस्ट पर आपका इंतजार रहेगा। धन्यवाद।

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