शनिवार, 19 मई 2012
शनिवार, 12 मई 2012
एक बार जन्म लेने दे माँ... संध्या शर्मा
नन्हे-नन्हे पाँवों से चलके
सुन तेरे घर मे आऊंगी मैं
होगी तेरे घर रोज दीवाली
इतनी खुशियाँ लाऊंगी मैं
नाज़ुक उंगलियों से तेरा
हाथ पकड़ना है मुझको
कोमल होठों से माँ तेरा
नेह स्पर्श करना मुझको
तोतली बोली में तुझको
मधुर गीत सुनाऊंगी मैं
तू जब थक जाएगी तो
तेरा मन बहलाऊंगी मैं
मैं कोई जिद नहीं करुँगी
मेरी साँसों को चलने दो
मत मारो मुझे कोख में
तुझे पुकार छुप जाऊँगी
थोडा चिढ़ाकर हंस लूँगी
कभी घोड़ा बनाकर तुझे
तेरी पीठ पर चढ लूंगी
सताउंगी झूठी कुट्टी करके
तेरे डांटने से नहीं चिढूंगी
नाराज न होऊंगी तुझसे
कभी न तुझसे मै रूठूंगी
मुझे खुद से दूर ना कर
मुझे जन्म लेने दे माँ
सुंदर जग मैं भी देखूं
मुझे जग मे आने दे माँ
गहने पहन श्रृंगार करके
तुझ सी चोटी लहराऊंगी
तेरे जैसी पहनूंगी साड़ी
छवि तेरी सी दिखलाऊंगी
पापा की मुंह लगी रहूंगी
उनसे शैतानी खूब करुंगी
अचंभे से मुस्काएगें पापा
जब अव्वल दर्जे आऊंगी
सब मुझे प्यार से देखेंगे
मुझमें दिखेगी तेरी सूरत
लेगा मन में स्नेह हिलोरें
तब चूमेगी तू मेरी मूरत
बड़ी होकर ससुराल जाउंगी
नाम तेरा मैं खूब करुंगी
एक भी बदनामी का दाग
तेरे माथे पे लगने न दूंगी
विदा जब करेगी मुझे तू
तेरे नयन भर न आयेंगे
जब कहेगें बेटी हो मुझसी
नयन तेरे बस छलक जाएगें
वादा सुन ले मेरा तू माँ
दूर रहकर भी पास रहूंगी
दु:ख हर लूंगी तेरे सब मैं
हरपल बनके आस रहूंगी
तेरा सुख मेरा सुख माना
मेरा जीवन अर्पण है माँ
मुझे मार ना विनय तुझसे
एक बार जन्म लेने दे माँ
सुन तेरे घर मे आऊंगी मैं
होगी तेरे घर रोज दीवाली
इतनी खुशियाँ लाऊंगी मैं
नाज़ुक उंगलियों से तेरा
हाथ पकड़ना है मुझको
कोमल होठों से माँ तेरा
नेह स्पर्श करना मुझको
तोतली बोली में तुझको
मधुर गीत सुनाऊंगी मैं
तू जब थक जाएगी तो
तेरा मन बहलाऊंगी मैं
मैं कोई जिद नहीं करुँगी
मेरी साँसों को चलने दो
मत मारो मुझे कोख में
एक बार जन्म लेने दो
तुझे पुकार छुप जाऊँगी
थोडा चिढ़ाकर हंस लूँगी
कभी घोड़ा बनाकर तुझे
तेरी पीठ पर चढ लूंगी
सताउंगी झूठी कुट्टी करके
तेरे डांटने से नहीं चिढूंगी
नाराज न होऊंगी तुझसे
कभी न तुझसे मै रूठूंगी
मुझे खुद से दूर ना कर
मुझे जन्म लेने दे माँ
सुंदर जग मैं भी देखूं
मुझे जग मे आने दे माँ
गहने पहन श्रृंगार करके
तुझ सी चोटी लहराऊंगी
तेरे जैसी पहनूंगी साड़ी
छवि तेरी सी दिखलाऊंगी
पापा की मुंह लगी रहूंगी
उनसे शैतानी खूब करुंगी
अचंभे से मुस्काएगें पापा
जब अव्वल दर्जे आऊंगी
सब मुझे प्यार से देखेंगे
मुझमें दिखेगी तेरी सूरत
लेगा मन में स्नेह हिलोरें
तब चूमेगी तू मेरी मूरत
बड़ी होकर ससुराल जाउंगी
नाम तेरा मैं खूब करुंगी
एक भी बदनामी का दाग
तेरे माथे पे लगने न दूंगी
विदा जब करेगी मुझे तू
तेरे नयन भर न आयेंगे
जब कहेगें बेटी हो मुझसी
नयन तेरे बस छलक जाएगें
वादा सुन ले मेरा तू माँ
दूर रहकर भी पास रहूंगी
दु:ख हर लूंगी तेरे सब मैं
हरपल बनके आस रहूंगी
तेरा सुख मेरा सुख माना
मेरा जीवन अर्पण है माँ
मुझे मार ना विनय तुझसे
एक बार जन्म लेने दे माँ
बुधवार, 9 मई 2012
शुक्रवार, 4 मई 2012
मनसरोवर के गीत ..... संध्या शर्मा
स्वाति बूंदों को तरसती
खुली सीप जैसी निर्जल आँखें
मस्तिष्क में चलती रेतीली आंधियां
ह्रदय में चुभते यादों के कांटे
मन के मानसरोवर में
मौन गीतों के राजहंस
अंतिम घड़ियाँ, अंतिम साँसें
जीवन का सारांश खोजती
कल्पना की आँखों से देखती वह
दूर क्षितिज पर ढलता सूरज
धौंकनी सी सांस लिए
उत्तुंग शिखर पर चढ़ती जा रही है
हाथों में थामे मौन गीतों की माला
मद्धम पड़ती मंदिर की घंटियों की आवाजें
तभी अचानक.....!
टूट गई मौन गीतों की माला
बिखर गए मोती-मोती
पथरा गई सागर सी गहरी आँखें
उभर आया उनमे अंतिम दृश्य
स्वर्णिम संध्या बेला
छोटा सा सूना आँगन
एक कोने में जलता नन्हा सा दीप
जो चीर रहा है तम को
फ़ैल रहा है चारों दिशाओं में
प्रकाश-प्रकाश और प्रकाश....
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