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शनिवार, 31 अगस्त 2019

मेरी नज़्म... संध्या शर्मा

 ख़यालों के पंख लगाकर
ख़्वाबों की उड़ान भरकर
कितनी भी दूर क्यों न चली जाए
लेकिन लौट आती है "मेरी नज़्म"
उतर आती है ज़मी पर
मेरे साथ नंगे पाँव घूमती है
पत्ता-पत्ता, डाल-डाल, बूटा -बूटा
इसलिए तो तरोताज़ा रहती है
जब कभी यादों के सात समंदर पार करके
थककर निढाल हो जाती है
तो बैठ जाती हैं मेरे साथ
साहिल की ठंडी रेत पर
जाने क्या लिखती - मिटाती
बड़ी शिद्द्त और ख़ामोशी से
देखती रहती है.....
ख्वाहिशों की तरह
लहरों का आना
और पत्थरों से चोट खाकर
बार-बार लौट जाना...

शनिवार, 12 जनवरी 2013

रोक सकोगे???... संध्या शर्मा

मेरे भीतर
आक्रोश की
उफनती
लहराती
फुंफकारती
धधकती
विकराल 
नदी है
रोक सकोगे???
सुना है
तुम...
समंदर हो

बुधवार, 25 जुलाई 2012

तू गुमान है मेरा...



उजाले खड़े हैं राह में
तेरे इंतज़ार में
बुलंद हौसलों की कश्ती
समंदर में उतार दे
तेरे इरादों की पतवार
पार कर लेगी हर समंदर
सुना है मंजिल की चाहत
मुश्किल आसान कर देती है
राह चाहे कितनी भी दुश्वार हो
मंजिल की ओर मुड़ जाती है
क्या हुआ जो वक़्त की धुंध छाये
आंधी चले या तूफ़ान आए
तू चल देख अब मंजिल करीब है
अपने ही हाथों लिखना अपना नसीब है
कुछ देर और शायद इम्तेहां है तेरा
सितारों के बीच तू आफ़ताब है मेरा
बस इतना समझ ले तू गुमान है मेरा
तू ख्वाब है मेरा, सारा जहान है मेरा...

सोमवार, 16 जुलाई 2012

रंगमंच... संध्या शर्मा

करती हूँ अभिनय
आती हूँ रंगमंच पर प्रतिदिन
भूमिका पूरी नहीं होती
हर बार ओढ़ती हूँ नया चरित्र
सजाती, संवारती हूँ
गढ़ती हूँ खुद को
रम जाती हूँ रज कर
कि खो जाये "मुझमे"
"मैं" कहीं....

अब तो हो गई है आदत
किरदार निभाने क़ी
हर आकार में ढल जाती हूँ

पानी सी.....
पहचान खोकर शायद
पा सकूँ खुद को
समंदर में सीप तो बहुत मिल जाते हैं
सीप में मोती हर किसी को नहीं
मिलता...