सिन्दूरी साँझ का आगमन
यामिनी की दस्तक लिए
बीत गया आज का दिन भी
कुछ देर विश्राम उजाले का
अन्धियारा भ्रमित हुआ
एकान्त की चादर ओढ़ कर
पसर जाना है इसको फिर
सन्नाटों के शोर में दबकर
सोच रहा है जीत गया
खोज स्वयं की करते-करते
कितना अरसा बीत गया
उषा की पहली किरण के साथ
क्षितिज के सतरंगी इन्द्रधनुष
चलाते हैं झिलमिलाते बाण
रोज-रोज मिटता अंधेरा
दिन के हौसलों के आगे
सच के सामने ख़ामोश
सरे आम हारता है वह
अगली रात लौटने को
मुस्कुराता चला जाता है…
.jpg)