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सोमवार, 27 जुलाई 2015

सुप्रभात...

किरणों का साथ पाकर
जीना सीखती आशाएँ 
मानो उड़ना चाहती हैं
क्षितिज के भी उस पार
अजब सुर्ख एहसास से 
जाग उठी सुबह के साथ..... 

रविवार, 28 सितंबर 2014

सिन्दूरी साँझ का आगमन ...



सिन्दूरी साँझ का आगमन 
यामिनी की दस्तक लिए 
बीत गया आज का दिन भी
कुछ देर विश्राम उजाले का 
अन्धियारा भ्रमित हुआ
एकान्त की चादर ओढ़ कर 
पसर जाना है इसको फिर 
सन्नाटों के शोर में दबकर
सोच रहा है जीत गया 
खोज स्वयं की करते-करते 
कितना अरसा बीत गया
उषा की पहली किरण के साथ
क्षितिज के सतरंगी इन्द्रधनुष 
चलाते हैं झिलमिलाते बाण 
रोज-रोज मिटता अंधेरा 
दिन के हौसलों के आगे 
सच के सामने ख़ामोश
सरे आम हारता है वह 
अगली रात लौटने को 
मुस्कुराता चला जाता है… 

मंगलवार, 17 अप्रैल 2012

"अंजोरिया".... संध्या शर्मा


अंधियारे में ज्योत जगाता 
आया दीप जलाने वाला
 मुरझाये जीवन में हमने 
पाया फूल खिलाने वाला

विरहा के पल-पल से उपजा
मधुर मिलन का बीज निराला 
 क्षितिज ओर से नीलगगन पर
फैला बनकर नया उजाला

अधरों से सुधा रस बरसा
नैनो से झलके मधुशाला
 झूम उठी हर डाली-डाली
पागल हुआ मन मतवाला

गीत ग़ज़ल में झलक उसकी
वह अक्षर की मोती माला
उर की हर धड़कन में गूंजे
राग सरगमिया यादों वाला

भाग्य लिखित जो भी होगा
पाएगा दुनिया में पाने वाला
बस एक नाम ही रह जाएगा
दुनिया का है खेल निराला