दुखों से प्यार है, मुझे
यही कहा था ना तुमने
और मुझे...
तुम पर फक्र है
जख्म को सहेजा
वेदनाओं की सीमा से परे
बगैर पैरासिटामाल के
आंसुओं के समन्दर को
अपनी आँखों में जगह दी
कितने तूफ़ान उठे
पर छलकने ना दिया
कवि ही पढ़ सकता है
आँखों में छिपी वेदना
कैसे समझेगा भला
तुम्हारे माथे के घाव को
कुमकुम का टीका
समझने वाला
अपने रिसते जख्मों पर
चन्दन का लेप करने वाला
देखो...वह अश्वत्थामा
भटकर रहा है अनवरत
अपने जख्मों के लिए
बेटाडीन मांगते द्वार-द्वार....
तुम भूलकर भी
द्वार बंद मत करना
ना ही उसे इंकार करना
क्योंकि... वह एक बेटाडीन ही है
जो उसके जख्म भरेगा
वही तुम्हारे लिए भी लाभकारी होगा ...
