रविवार, 28 सितंबर 2014

सिन्दूरी साँझ का आगमन ...



सिन्दूरी साँझ का आगमन 
यामिनी की दस्तक लिए 
बीत गया आज का दिन भी
कुछ देर विश्राम उजाले का 
अन्धियारा भ्रमित हुआ
एकान्त की चादर ओढ़ कर 
पसर जाना है इसको फिर 
सन्नाटों के शोर में दबकर
सोच रहा है जीत गया 
खोज स्वयं की करते-करते 
कितना अरसा बीत गया
उषा की पहली किरण के साथ
क्षितिज के सतरंगी इन्द्रधनुष 
चलाते हैं झिलमिलाते बाण 
रोज-रोज मिटता अंधेरा 
दिन के हौसलों के आगे 
सच के सामने ख़ामोश
सरे आम हारता है वह 
अगली रात लौटने को 
मुस्कुराता चला जाता है… 

9 टिप्‍पणियां:

  1. " रोज-रोज मिटता अंधेरा
    दिन के हौसलों के आगे
    सच के सामने ख़ामोश
    सरे आम हारता है वह
    अगली रात लौटने को
    मुस्कुराता चला जाता है… "
    सुंदर रचना ……नकारात्मकता पर सकारात्मकता की जीत को दर्शाती हुई…

    उत्तर देंहटाएं
  2. सांझ, रात और भोर की जंग है जो रोज़ होती है ... सदियों से चल रही है ...
    पर कौन जीतता है ... शायद आशा ...

    उत्तर देंहटाएं
  3. बहुत ही रहिस्य से भरी पँक्तिया
    आपका ब्लॉगसफर आपका ब्लॉग ऍग्रीगेटरपर लगाया गया हैँ । यहाँ पधारै

    उत्तर देंहटाएं
  4. क्या बात.... बहुत सुन्दर लिखती हैं आप ..

    उत्तर देंहटाएं
  5. अँधेरा घना कितना हो , सूरज निकलता है !
    सार्थक रचना !

    उत्तर देंहटाएं
  6. बहुत खूबसूरत........भावुक करते जज़्बात |

    उत्तर देंहटाएं