इस मायावी संसार में
मनुष्य भौतिक सुखों की चाह
और
बंधन मुक्ति की कामना करता है
भौतिक सुख और
आत्मिक शांति के द्वंदों के बीच
फंसे इंसान को
मौत से डर लगता है
इस उधेड़ बुन में
वह भूल जाता है, स्वयं.....
अपने अस्तित्व को
कि वह शरीर नहीं !
आत्मा है...
मन और बुद्धि
जिस पर इन्सान इतराता है
भूलकर अपने मूल को
वह आत्मा से अलग नहीं
मन और बुद्धि...
यह योग्यता है आत्मा की
और उसे रहता हमेशा देह का भान
अर्थात "देहाभिमान"
मनुष्य भौतिक सुखों की चाह
और
बंधन मुक्ति की कामना करता है
भौतिक सुख और
आत्मिक शांति के द्वंदों के बीच
फंसे इंसान को
मौत से डर लगता है
इस उधेड़ बुन में
वह भूल जाता है, स्वयं.....
अपने अस्तित्व को
कि वह शरीर नहीं !
आत्मा है...
मन और बुद्धि
जिस पर इन्सान इतराता है
भूलकर अपने मूल को
वह आत्मा से अलग नहीं
मन और बुद्धि...
यह योग्यता है आत्मा की
और उसे रहता हमेशा देह का भान
अर्थात "देहाभिमान"
संध्या शर्मा