"आई बसंत बहार"
पहन सुहानी धानी चूनर,
धरती ने किया श्रंगार,
सरसों पर छाई है मस्ती,
आई बसंत बहार...........
तितली फिरती फूल-फूल पर,
कलियों ने भी घूंघट खोला,
कोयल मीठे गीत सुनाती,
भौरों का मन भी है डोला,
कल-कल, कल-कल नदियाँ बहती,
झर-झर, झर-झर झरते झरने,
क्यारी-क्यारी लगी मुस्काने,
गेहूं जौ लगे लहराने,
चिड़िया चहकी, बुलबुल गाए,
भोर सुहानी सबको भाए,
ठंडी-ठंडी चली पुरवाई,
मौसम पर जवानी छाई,
वन उपवन को मिला नवजीवन,
पुलकित है मेरा भी मन........
रंग-बिरंगे फूल खिले हैं,
मिलकर सब गाते मल्हार,
आई बसंत बहार...
आई बसंत बहार.........