अन्याय की धुआंधार बारिश में,
संघर्ष वृक्ष के बीज का,
तू अंकुर बन,
जड़ जमा ले गहरे तक और,
फल - फूल,
तूफान उठें, या गरजें बादल,
तुझे आकाश छूना है,
अपने जैसे असंख्य बीजों को,
जन्म देना है.
"मैं एक वृक्ष नहीं,
संघर्ष वृक्ष के बीज का,
तू अंकुर बन,
जड़ जमा ले गहरे तक और,
फल - फूल,
तूफान उठें, या गरजें बादल,
तुझे आकाश छूना है,
अपने जैसे असंख्य बीजों को,
जन्म देना है.
"मैं एक वृक्ष नहीं,
जंगल उगाना चाहती हूँ...
एक बाग नहीं,
संसार सजाना चाहती हूँ...."
संसार सजाना चाहती हूँ...."
