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मंगलवार, 29 जनवरी 2013

पहरा.... संध्या शर्मा

बावली है... 
आजकल उसे
चंदामामा, बिल्ली मौसी,
चिड़िया रानी, परियों के
सपने नहीं आते
उनकी जगह
सियार, भेड़िये,सांप
धुंए के उड़ते हुए
बवंडरों ने ले ली है 
बहुत कोशिश की उसने
लेकिन इन्हें बदल ना सकी 

धीरे - धीरे समझने लगी है
सोते जागते हर पल
उसके देह और मन पर 
जीवन भर.........!

अदृश्य नज़रों का पहरा है
सपनो पर भी....