सोचो जरा
उन्हें भी तो चाहिए
उगते सूरज की
उजली किरणें
शोषण से मुक्ति
अपने बनते हो न
चलो तुम्ही बताओ
किस श्रेणी में रखूं तुम्हे
शोषक या शोषित
कभी मौन होकर
देखते हो उन्हें
तिल-तिल जलते
कभी घमंड बोलता है
तो कभी काले फीते
कभी सुनाई दे जाते
लाल झंडे के गीत
इन सब के बीच
चुक जाती है
धीरे - धीरे...!!!
आम इंसान की
रेंगती सी ज़िंदगानी
प्रश्न उठता है ....
होगा क्या …?
शोषितों के हित में
व्यवस्था परिवर्तन ??
व्यक्ति परिवर्तन??
या फिर से सुनाई देगा
कुछ समय बाद
वही पुराना राग
जलने वाला जलेगा
और जलाने वाला
सरकाता रहेगा
गीली लकड़ियाँ
धुंधकारी होकर ………
