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शनिवार, 11 जनवरी 2014

अंतिम छोर...


प्रायवेट वार्ड नं. ३
जिन्दगी/मौत के मध्य
जूझती संघर्ष करती
गूंज रहे हैं तो केवल
गीत जो उसने रचे
जा पहुंची हो जैसे
सूनी बर्फीली वादियों में
वहाँ भी अकेली नहीं
साथ है तन्हाइयां
यादों के बड़े-बड़े चिनार
मरणावस्था में पड़ी
अपनी ही प्रतिध्वनि सुन
बहती जा रही है
किसी हिमनद की तरह
ब्रह्माण्ड के अंतिम छोर तक.....