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मंगलवार, 4 अप्रैल 2017

ओ गौरैया !

ओ गौरैया !
अब लौट आओ
बदल गया है इंसान
प्रकृति प्रेमी हो गया है
आकर देखो तो ज़रा
इसके कमरे की दीवारें
भरी पड़ी है तुम्हारे चित्र से
ऐसे चित्र
जिनमें तुम हो,
तुम्हारा नीड़ है,
तुम्हारे बच्चे है
सीख ली है इसने
तुम्हारी नाराज़गी से
सर आँखों पर बिठाएगा
तिनका- तिनका संभालेगा
ओ गौरैया !
आ भी जाओ
तुम्हे मिलेगा
तुम्हारे सपनों का संसार !
और तुम
यह सब देखकर
पहले की तरह
खुश हो पाओगी
आँगन - आँगन चहकोगी
बाहर-भीतर भागोगी
तो फुदको आकर
मुँडेर - मुँडेर
बना लो न!
हमारे घर को
तुम्हारा भी घर....

मंगलवार, 22 मई 2012

ठिकाना...संध्या शर्मा


रफ़्ता रफ़्ता घर को सजाना होगा,
सपनों की जन्नत को बसाना होगा.

कभी तो आएगा चलकर यहाँ वो,
सफ़र में जो मुसाफ़िर बेगाना होगा.

दर्द दिया है जो उस जालिम ने,
रफ़्ता रफ़्ता उसे भी भुलाना होगा.

वस्ल की बात हो तो क्या कहने,
गमों को बंदनवार सा सजाना होगा.

बहुत भटके इस जहाँ में सितमगर,
गर वो मिल जाएं तो ठिकाना होगा.

बुधवार, 16 नवंबर 2011

झरते पीले पात... संध्या शर्मा

अस्पष्ट सा बोलना उनका
हर वक़्त जल्दी में रहना उनका
जैसे सारे घर की चिंता सिर्फ उन्हें ही हो 
जब से रिटायर हुए हैं
बढ़ता ही जा रहा है यह सब
थोड़ी सी देर के लिए भी
किसी भी काम से घर से निकलना
तो सारे घर वालों को वापस आने की सूचना देना
आता हूँ बहू...
आता हूँ बेटा...
आता हूँ जल्दी से जाकर
नाती को स्कूल भेजने जाना हो बस स्टॉप पर
या पास के मंदिर ही क्यों न जाना हो
वही आवाज़ सुनाई पड़ती है कानो में
आता हूँ.....
पुरानी सी खटारा हो चुकी सायकल पर
अपनी कमज़ोर सी  टांगें डालते
कभी खांसते, कभी मुस्कुराते
कभी झुंझलाकर धीरे - धीरे बडबडाते
आदत सी हो गयी है इस आवाज़ की
सिर्फ मेरे ही नहीं
आस - पड़ोस के अनेक कानो को
घर वाले हों या बाहर वाले
नए पुराने
हर कानो को
और आज अचानक....?
पता लगा चले गए
बिना बताये ही किसी को भी
बहुत दूर
वह भी हमेशा- हमेशा के लिए
एक अनंत सफ़र पर
और जाते वक़्त खबर भी न लगने दी
इस कान से उस कान को भी....