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शुक्रवार, 9 दिसंबर 2011

अल्हड़ बादल.... संध्या शर्मा

कभी कविता मिल जाती थी
विद्यार्थियों के अल्हड चेहरे पर
कोतुहल भरे भाव दिखते थे
नन्ही सी सुन्दर आँखों में
अब ना चेहरे पर पहचान है
ना ही आँखों में हैं भाव
सिर्फ बढ़ते ही जा रहे हैं
ऊंचाई में, आयु में
सिर्फ शरीर से
खोखली संवेदना लिए
कविता से दूर
परीक्षा में अंको के लिए
याद कर लेते है उसे
सिर्फ शब्दों की तरह
अब कोई कविता उन्हें
हँसाती नहीं
न ही भाव रुलाते हैं
"ओ हरे मन की कोमल कलियों
तुम कविता के फूल खिलाओ
सपनो की तितली बन जाओ
उजड़ा बाग़ महकाओ
बादलों की पतंग उडाओ
तारों की नदिया लहराओ
हवाओं के काँधे पर चढ़कर
सारी दुनिया घूम कर आओ
कविता गाओ, गीत बनाओ.... :)"