गुरुवार, 8 अक्टूबर 2015

नदियों के संरक्षण हेतु “मीडिया चौपाल” ग्वालियर में देश भर से होगा जुटान ...

नदियाँ प्राकृतिक संपदा ही नहीं, जनमानस की भावनात्मक आस्था का आधार होने के साथ-साथ सामाजिक, साहित्यिक, सांस्कृतिक और आर्थिक दृष्टि से भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। सम्पूर्ण मानवता व सभ्यता का अस्तित्व  नदियों के अस्तित्व पर ही है। नदियां या तो मृतप्राय हो चुकी हैं या सूख गई हैं। मानव की अदूरदर्शिता, प्राचीन परम्परा तथा देश का कथित विकास इसके लिए जिम्मेवार है। हमारा लक्ष्य नदियों के अविरल और निर्मल प्रवाह को पुनः प्राप्त करना है। नदियों के क्षरण  रोकने के लिए मीडिया के साथ, नागरिकों व सामाजिक संगठनों को इस दिशा में त्वरित कदम उठाना होगा और अगर हम अब भी सजग ना हुए तो अगली पीढ़ी हमें कभी माफ नहीं करेगी. 

चिंता का मुख्य विषय यह है कि कैसे अकाल मौत का शिकार हो रही नदियों को पुनर्जीवन दिया जाए। नदियों में घटता पानी कैसे बढ़ाया जाए। नद जल में बढ़ते प्रदूषण की रोकथाम कैसे हो। नदियों के किनारे, जमीन और जलग्रहण क्षेत्र को कैसे बचाया जाए। नदियों से जुड़े जन-जीवन, संस्कृति, खेती, जैव विविधता की रक्षा कैसे की जाए। शासन और समाज को नदी का अर्थशास्त्र कैसे समझाया जाए। इन सब महत्वपूर्ण कार्यों में सरकार, स्वयंसेवी संस्थाओं और समाज की भूमिका क्या हो। 

स्पंदन संस्था,  भोपाल  वर्ष 2012 से मध्य प्रदेश विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी परिषद् के साथ मिलकर चौपाल का आयोजन कर रही है. नदी संरक्षण विषय पर राष्ट्रीय विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी संचार परिषद, भारत सरकार के सहयोग से इस वर्ष भी राष्ट्रीय मीडिया कार्यशाला (मीडिया चौपाल) 11-12 अक्टूबर 2015 को गालव सभागार, जीवाजी विश्वविद्यालय, ग्वालियर, मध्यप्रदेश में आयोजित की गई है। जिसमे कुलपति प्रो. बृजकिशोर कुठियाला, राज्यसभा सांसद प्रभात झा, सीनियर ब्यूरोक्रेट उमाकांत उमराव सहित देश भर से जल संरक्षण के क्षेत्र में काम कर रहे वैज्ञानिक, प्रोफ़ेसर, मीडिया कर्मी, ब्लागर, सोशल मीडिया एक्टिविस्ट, रंगकर्मी साहित्यकार, कालमनिस्ट, छात्र, एवं सामाजिक कार्यकर्त्ता बड़ी संख्या में भाग लेंगे। दो दिनों तक चलने वाले विभिन्न सत्रों में इस सब पर व्यापक मंथन होगा।  कार्यक्रम के मुख्य आयोजक स्पंदन संस्था के संयोजक श्री अनिल सौमित्र हैं । जिसमें 

मुख्य विषय : नदी संरक्षण में मीडिया की भूमिका
उप-विषय :
भारत की नदियां : कल, आज और कल
मध्यप्रदेश की नदियां : कल, आज और कल
जनमाध्यमों में नदियां : स्थिति, चुनौतियां और सम्भावनायें हैं ।

आयोजक संस्था इस वर्ष एक "स्मारिका" का प्रकाशन कर विगत वर्षों में  हुए मीडिया चौपाल की जानकारी, सहभागियों का परिचय मीडिया और नदी विषय से जुड़े शोध व विचारों की जानकारी भी देगी। 

गुरुवार, 24 सितंबर 2015

मनोकामना सिद्ध महालक्ष्मी उत्सव...



महाराष्ट्र में महालक्ष्मी का तीन दिवसीय पर्व भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की सप्तमी से आरम्भ होता है। "महालक्ष्मी आली घरात सोन्याच्या पायानी भर भराटी घेऊन आली सर्व समृद्धि घेऊन आली, पंक्तियों के साथ महालक्ष्मी की अगवानी की जाती है। माता लक्ष्मी सपरिवार पधारें व हर घर में सुख समृद्धि और सदैव लक्ष्मी का वास हो ऐसी मनोकामनाओं के साथ इस तीन दिवसीय महालक्ष्मी उत्सव का आयोजन कर कई पीढिय़ों से चली आ रही परंपरा का बडी ही श्रद्धा व उत्साह से निर्वाह किया जाता है। आकर्षक सज्जा और तीन दिनों तक विविध आयोजन किए जाते हैं।

लक्ष्मी ‘लक्ष्य’ शब्द से बना है। जिसका अर्थ होता है ‘चिन्ह।’ लेकिन किस चिन्ह विशेष से लक्ष्मी बनी है, यह अज्ञात है। वह मानते हैं कि स्वस्तिक चिन्ह लक्ष्मी का ही प्रतीक है। लक्ष्मी की पूजा में आज भी स्वस्तिक चिन्ह बनाया जाता है। दिवाली के दिन व्यापारी अपने बही-खाते में स्वस्तिक का चिन्ह बनाकर ‘शुभ- लाभ’ लिखते हैं और उसकी पूजा करते हैं।

माँ लक्ष्मी के 8 रूप माने जाते है | हर रूप विभिन्न कामनाओ को पूर्ण करने वाला है | दिवाली और हर शुक्रवार को माँ लक्ष्मी के इन सभी रूपों की वंदना करने से असीम सम्पदा और धन की प्राप्ति होती है |

१) आदि लक्ष्मी या महालक्ष्मी :

माँ लक्ष्मी का सबसे पहला अवतार जो ऋषि भृगु की बेटी के रूप में है।

२) धन लक्ष्मी :

धन और वैभव से परिपूर्ण करने वाली लक्ष्मी का एक रूप | भगवान विष्णु भी एक बारे देवता कुबेर से धन उधार लिया जो समय पर वो चुका नहीं सके , तब धन लक्ष्मी ने ही विष्णु जी को कर्ज मुक्त करवाया था |

३) धन्य लक्ष्मी :

धन्य का मतलब है अनाज : मतलब वह अनाज की दात्री है।

४) गज लक्ष्मी :

उन्हें गज लक्ष्मी भी कहा जाता है, पशु धन की देवी जैसे पशु और हाथियों, वह राजसी की शक्ति देती है ,यह कहा जाता है गज - लक्ष्मी माँ ने भगवान इंद्र को सागर की गहराई से अपने खोए धन को हासिल करने में मदद की थी । देवी लक्ष्मी का यह रूप प्रदान करने के लिए है और धन और समृद्धि की रक्षा करने के लिए है।

५) सनातना लक्ष्मी :

सनातना लक्ष्मी का यह रूप बच्चो और अपने भक्तो को लम्बी उम्र देने के लिए है। वह संतानों की देवी है। देवी लक्ष्मी को इस रूप में दो घड़े , एक तलवार , और एक ढाल पकड़े , छह हथियारबंद के रूप में दर्शाया गया है ; अन्य दो हाथ अभय मुद्रा में लगे हुए है एक बहुत ज़रूरी बात उनके गोद में एक बच्चा है।

६) वीरा लक्ष्मी :

जीवन में कठिनाइयों पर काबू पाने के लिए, लड़ाई में वीरता पाने ले लिए शक्ति प्रदान करती है।

७) विजया लक्ष्मी या जाया लक्ष्मी :

विजया का मतलब है जीत। विजय लक्ष्मी जीत का प्रतीक है और उन्हें जाया लक्ष्मी भी कहा जाता है। वह एक लाल साड़ी पहने एक कमल पर बैठे, आठ हथियार पकडे हुए रूप में दिखाई गयी है ।

८) विद्या लक्ष्मी :

विद्या का मतलब शिक्षा के साथ साथ ज्ञान भी है ,माँ यह रूप हमें ज्ञान , कला , और विज्ञानं की शिक्षा प्रदान करती है जैंसा माँ सरस्वती देती है। विद्या लक्ष्मी को कमल पे बैठे हुए देखा गया है , उनके चार हाथ है , उन्हें सफेद साडी में और दोनों हाथो में कमल पकड़े हुए देखा गया है , और दूसरे दो हाथ अभया और वरदा मुद्रा में है.

मान्यता है कि माता लक्ष्मी के जिन रूपों की पूजा की जाती है वो जेठानी व देवरानी हैं। अपने दो बच्चों के साथ वे इन दिनों मायके आती हैं। मायके में आने पर तीन दिनों तक उनका स्वागत किया जाता है। पहले दिन स्थापना, दूसरे दिन भोग और तीसरे दिन हल्दी कुमकुम के साथ माता की विदाई। तीनों दिनों में महालक्ष्मी की प्रतिमा ज्येष्ठा व कनिष्का का विशेष शृंगार किया जाता है। ज्येष्ठा लक्ष्मी को दरिद्रा कहा गया है और इसके आने की आहट ही प्राण हरण जैसी दुखदाई होती है। लोग इसे जाते हुए देखकर ही खुश होते हैं। इस पर्व में कनिष्ठा के संग ज्येष्ठा भी पूजित होती है। कहा जाता है कि पीहर की महिमा ही अलग है, वहां तो सभी बेटियों को बराबर मान मिलता है।

गुझियों का फुलहरा बांधकर की जाती है महालक्ष्मी की पूजा । घरों में तरह-तरह के पकवान बनते हैं। यह पूजा विशेषकर घर की बहुओं द्वारा की जाती है। लक्ष्मी की इन मूर्तियों की स्थापना अनाज मापने वाली पायली के ऊपर की जाती है, जिसमे अंदर गेहूं और चावल भरे जाते हैं, जो इस बात का प्रतीक है कि घर धन-धान्य से भरा रहे।

महालक्ष्मीजी की विदाई में विशेष दाल, चावल, गुझिया, मोदक, चिरवंट, सेवइयां की खीर व अनेक तरह के मिष्ठान सहित विशेष रुप से सोलह प्रकार की सब्जियों का भोग लगाया जाता है। पुरणपोली, पातलभाजी के साथ छप्पन भोग लगाया जाता है। छप्पन भोगों में पुरणपोली, सेवइयां, चावल की खीर, पातलभाजी, तिल्ली, खोपरा, खसखस तथा मूंगफली के दाने की चटनी, लड्डू, करंजी, मोदक, कुरोडी, पापड़, अरबी के पत्ते आदि का भोग लगाया जाता है। विशेष रूप से ज्वार के आटे की आम्बिल और पूरणपोली का महाप्रसाद प्रमुख होता है। छप्पन पकवान तैयार कर केले के पत्ते पर भोग लगाया जाता है। इसके बाद परंपरानुसार सर्वप्रथम सुहागिनों को भोजन व प्रसाद का वितरण किया जाता है। तदुपरांत बंधु-बांधव व कुटुंब सहित महाप्रसाद भोज किया जाता है। मान्यता है कि माता लक्ष्मी की आराधना से सुख संपन्नता व समृद्धि के साथ-साथ सभी मनोकामना पूर्ण होती है।

गुरुवार, 27 अगस्त 2015

बेटियों से ही तीज त्यौहार के रंग...

भारत देश उत्सव, पर्वों, रंगों एवं विभिन्न संस्कृतियों का संगम है,यहां साल भर, हर मौसम में प्रतिदिन त्यौहार मनाए जाते हैं यह हमारी
प्राचीन एवं उन्नत संस्कृति का परिचायक है। इन त्यौहारों में हमारी उत्सवधर्मिता एवं संस्कारों की झलक दिखाई देती है. त्यौहारों का यह देश अपनी विविधता में एकता के लिए ही विश्व भर में जाना जाता है। 

रक्षाबंधन हमारी संस्कृति की पहचान है और ऐतिहासिक, धार्मिक एवं पौराणिक महत्व रखने वाले इस त्यौहार पर हर भारतवासी को गर्व है। लेकिन वर्तमान समय में भारत में इस पर्व को गंभीरता से लेने की आवश्यक है, क्योंकि एक तरफ तो  बहनों की रक्षा के लिए इस विशेष पर्व को मनाया जाता है वहीं दूसरी ओर कन्या भ्रूण हत्या जैसे अपराधों की संख्या तेज़ी से बढ़ती जा रही है। यदि कन्या-भ्रूण हत्या पर जल्द ही काबू नहीं पाया तो देश में लिंगानुपात और भी अधिक तेज  गति से घट जाएगा जिससे सामाजिक असंतुलन बढ़ेगा। 

सख्त कानून और जागरूकता अभियानों के बावजूद देश में लिंगानुपात में तेजी से गिरावट दर्ज की जा रही है। विकास के मुद्दे पर चुनाव
लड़ रही राजनीतिक पार्टियों के लिए आधी आबादी आज भी कोई मुद्दा नहीं है. 2001 से 2011 के बीच शिशु लिंगानुपात में तेज गिरावट दर्ज की गई है.  2011 की जनगणना के अनुसार स्त्री-पुरुष लिंगानुपात 940 प्रति हजार है, लेकिन 0-6 वर्ष के बच्चों में लड़कियों का अनुपात घटकर महज 914 ही रह गया है। गणना के दौरान यह भी पता चला कि हरियाणा में ऐसे 70 गांव हैं जहां कई वर्षों से एक भी बच्ची ने जन्म नहीं लिया है। ऐसे में ‘बेटी पढ़ाओ बेटी बचाओ’ जैसे नारे महज छलावा लगते हैं। 

बेटी को बोझ समझने की मानसिकता को बदलना होगा, तभी हम स्वस्थ व संतुलित समाज की कल्पना को साकार करने में सफल होंगे। महिलाओं को स्वयं आगे बढ़कर अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़नी होगी और कन्या भ्रूण हत्या रोकने के लिए प्रयास करने होंगे। बेटियाँ होगी तभी हम तीज त्यौहार मना सकेगें। बेटे -बेटी के भेदभाव को खत्म करके संतुलित समाज की स्थापना होगी। तभी इस पर्व की सच्ची सार्थकता होगी।  हम आशा करते हैं कि और रक्षाबंधन का यह त्यौहार हमेशा हर्षोल्लास के साथ मनाए जाएगा और हर भाई को बहन के प्रति अपने कर्तव्य की याद दिलाता रहेगा। 

बुधवार, 19 अगस्त 2015

इतिहास के झरोखे से : रानी दुर्गावती...

जन्म स्थान होने की वजह से अनेको बार इस स्थान को देखा है, उस वक़्त भी जब यह पर्यटकों के लिए पूर्णतः खुला था। आजकल इस किले की ऊपरी मंज़िल पर जाने वाली सीढ़ियों पर सुरक्षा की दृष्टि से ताला लगा दिया गया है.

गढ़ा की मुख्य सड़क से अंदर के रास्ते पर सुन्दर प्राकृतिक दृश्यों के साथ-साथ काले पत्थर अनेक रूपों में दिखाई देते हैं, जिसमे से एक विश्व प्रसिद्ध संतुलित शिला भी है. 
    
जबलपुर के मदन महल में एक पहाड़ी पर स्थित गोंड रानी दुर्गावती का किला जो लगभग सन् १११६ मे राजा मदन शाह द्वारा बनवाया गया था। आज भी उनके अनुपम तेज, साहस, शौर्य और सुन्दरता की कहानी कहता शीश उठाये खड़ा है। 


महारानी दुर्गावती कालिंजर के राजा कीर्तिसिंह चंदेल की एकमात्र संतान थीं। महोबा के राठ गांव में 1524 ई0 की दुर्गाष्टमी पर जन्म के कारण उनका नामदुर्गावती रखा गया। नाम के अनुरूप ही तेज, साहस, शौर्य और सुन्दरता के कारण इनकी प्रसिद्धि सब ओर फैल गयी। दुर्गावती के मायके और ससुराल पक्ष की जाति भिन्न थी लेकिन फिर भी दुर्गावती की प्रसिद्धि से प्रभावित होकर गोंडवाना के राजा संग्राम शाह ने अपने पुत्र दलपत शाह से विवाह करके, उसे अपनी पुत्रवधू बनाया था।


दुर्भाग्यवश विवाह के चार वर्ष बाद ही राजा दलपतशाह का निधन हो गया। उस समय दुर्गावती की गोद में तीन वर्षीय नारायण था। अतः रानी ने गढ़मंडला का शासन संभाल लिया। 
रानी दुर्गावती के इस सुखी और सम्पन्न राज्य पर मालवा के मुसलमान शासक बाजबहादुर ने कई बार हमला किया, पर हर बार वह पराजित हुआ। तथाकथित महान मुगल शासक अकबर भी राज्य को जीतकर रानी को अपने हरम में डालना चाहता था। उसने विवाद प्रारम्भ करने हेतु रानी के प्रिय सफेद हाथी (सरमन) और उनके विश्वस्त वजीर आधारसिंह को भेंट के रूप में अपने पास भेजने को कहा. रानी ने यह मांग ठुकरा दी.

इस पर अकबर ने अपने एक रिश्तेदार आसफ खां के नेतृत्व में गोंडवाना पर हमला कर दिया. एक बार तो
आसफ खां पराजित हुआ, पर अगली बार उसने दुगनी सेना और तैयारी के साथ हमला बोला। दुर्गावती के पास उस समय बहुत कम सैनिक थे। उन्होंने जबलपुर के पास नरई नाले के किनारे मोर्चा लगाया तथा स्वयं पुरुष वेश में युद्ध का नेतृत्व किया। इस युद्ध में 3,000 मुगल सैनिक मारे गये लेकिन रानी की भी अपार क्षति हुई थी।

अगले दिन 24 जून 1564 को मुगल सेना ने फिर हमला बोला. आज रानी का पक्ष दुर्बल था, अतः रानी ने अपने पुत्र नारायण को सुरक्षित स्थान पर भेज दिया. तभी एक तीर उनकी भुजा में लगा, रानी ने उसे निकाल फेंका. दूसरे तीर ने उनकी आंख को बेध दिया, रानी ने इसे भी निकाला पर उसकी नोक आंख में ही रह गयी। तभी तीसरा तीर उनकी गर्दन में आकर धंस गया।
रानी ने अपना अंत समय निकट जानकर वजीर आधारसिंह से आग्रह किया कि वह अपनी तलवार से उनकी गर्दन काट दे, पर वह इसके लिए तैयार नहीं हुआ। अतः रानी अपनी कटार स्वयं ही अपने सीने में भोंककर आत्म बलिदान कर दिया।महारानी दुर्गावती ने अकबर के सेनापति आसफ़ खान से लड़कर अपने आत्म बलिदान से पूर्व पंद्रह वर्षों तक शासन किया था।

जबलपुर के पास जहां यह ऐतिहासिक युद्ध हुआ था, उस स्थान का नाम बरेला है, जो मंडला रोड पर स्थित है, वही रानी की समाधि बनी है, जहां जाकर लोग अपने श्रद्धासुमन अर्पित करते हैं। जबलपुर मे स्थित रानी दुर्गावती यूनिवर्सिटी भी इन्ही रानी के नाम पर बनी हुई है।