सोमवार, 16 फ़रवरी 2015

कहाँ गए तुम्हारे सामुद्रिक संस्कार???

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हे उद्दात लहरों ...
कौन भड़काता है तुम्हे
कौन सिखाता है तुम्हे
क्यों ठेस पहुंचाती हो
क्यों ख़ुदको छलती हो
क्या यही सभ्यता है
क्या यही परंपरा है
कहाँ गए तुम्हारे मर्यादित
सामुद्रिक संस्कार???
यह कैसा अधिकार
क्यों न तुम्हें बांध दिया जाए
बंधनों की बेड़ी से 
वह भी बिल्कुल अकेले
फिर खूब चीख़ना - चिल्लाना
सवाल करना ख़ुद से
और जवाब भी देना
देखना निरूत्तर हो जाओगी
क्योंकि मर्यादाओं को तोड़ना
बंधनों को तोड़ने से कहीं अधिक
मुश्किल और कठिन है...

सोमवार, 2 फ़रवरी 2015

आंखर चाय...


शब्दों की भीनी मिठास
भावों की महक को
जब शृंगार के जल में
व्याकरणी दूध खौलाकर
डबकाते होगें कुछ देर
तो कविता सी 
बनती होगी चाय उनकी
ताज़गी से भरपूर  
दार्जलिंगी गमक लिए
महकते शब्दों को 
जायकेदार ख़ुश्बू संग
खूब खौलाते हैं 
बड़ी शिद्दत से वो 
जैसे चाय नही पक रही 
कोई कविता उबल रही हो
उबलेगी, खौलेगी, छनेगी 
फ़िर प्रस्तुत की जाएगी 
प्यालियों रकाबियों में \
किताबों की तरह
व्यवस्था परिवर्तन के लिए
क्रांति का उद्घोष करती...

मंगलवार, 27 जनवरी 2015

पुरानी ज़िद...


अक्षर अक्षर 
शब्द मेरे  
जानती नहीं 
कब हो गए 
भाव तुम्हारे  
इस सफ़र का
पता ही न चला 
करने लगे हो 
मेरे ही मन में 
खूब मनमानी 
और देखो न 
इठलाती इतराती
अल्‍हड़ बच्ची सी
मैं आज भी 
लगी रहती हूँ 
तुमसे अपनी 
हर बात मनवाने की 
उसी पुरानी ज़िद में
नई नई ज़िद लेकर....

शनिवार, 24 जनवरी 2015

हे री सखी बसंत है आयो....


हे री सखी बसंत है आयो
झूमे लीम लीम की डारी, बरगद है हरियायो
गेंदा संग चमेली फ़ूली, रंग चहूं दिसि छायो।
हे री सखी बसंत है आयो।

हिय जली आग लगन की, जब उन बिसरायो
काग मुंडेर पे बैठ के बोलो, पिय संदेशा लायो।
हे री सखी बसंत है आयो।

मोरे आंगन की खिलगी क्यारी न्यारी प्यारी
जब परदेश की खबरिया कारो कागा लायो
हे री सखी बसंत है आयो।

नार - कचनार हुलसी, हुलस- हुलस सतायो
दूर देश में हमार बलम, यहाँ बसंत तू आयो
हे री सखी बसंत है आयो।

चलो बांध लो गांठ प्रीत की आम बौर गदरायो
बाट बटोही की देखे पलास बसंत अगन लगायो
हे री सखी बसंत है आयो।