बुधवार, 14 जनवरी 2015

संक्रांति - सिन्दूर सहेजती माँ ...

संक्रांति के एक दिन पहले
खूब सारा दूध कंडे की आग में
गुलाबी गाढ़ा होने तक पकाती,
फिर मिट्टी के बर्तन में उसी दूध से
मलाईदार दही जमाती थी माँ
संक्राति के दिन सबको
चूड़े (पोहे), गुड के साथ खिलाती
तब ना जाने क्यों मुझे
खाना अच्छा नही लगता था
शायद खूब सारा देखकर
अघा जाते होंगे हम
और लड्डुओं की तो ना ही पूछो    
सफ़ेद तिल, काली तिल, मूंगफली
मुरमुरे, आटे में बेसन के सेव डालकर
और जाने कितने तरह के बनाती
चूड़ी, बिंदिया, महावर, बिछुए
सुहागिनों को उपहार देती
कोई भी कमी ना रखती
किसी भी बात में
ऊपर से कोई रोक - टोक न करती
खिलाना हो या लेना - देना
इतनी खुले मन और विचारों वाली माँ
एक जगह बड़ी कंजूसी करती
थोड़ा सा सिन्दूर और दो-दो चूड़ियाँ
बस यही सिंगार थे उसके
एक दिन पूछ बैठी मैं कारण
तो समझाते हुए बोली
"देख! सिन्दूर सहेजती हूँ मैं
थोड़ा-थोड़ा सा खर्च करती हूँ
ताकि अपनी पूरी उम्र पा सकूँ
यही सीख मुझे मेरी माँ से मिली
और मैं तुझे दे रही हूँ "
सचमुच सर्दी की गुनगुनी सी धूप सी माँ
अपने घर परिवार आँगन को सजाकर
सिंदूरी चूनर ओढ़े साँझ की तरह
लाल बिंदिया माथे पर सजाए
संतोष भरी मुस्कान के साथ
चली तो गई दूर हमसे
लेकिन १५ वर्ष होने को हैं
आज भी सहेजे हुए है
हम सबके लिए अपने सुहाग को
और साथ है हमारे पापा के रूप में ....

उत्तरायण का सूर्य आप सभी के जीवन में नव ऊर्जा एवं उल्लास भर दे।  आप सभी को मकर संक्रांति, खिचड़ी, बिहू, पोंगल व लोहड़ी की बधाई...

बुधवार, 31 दिसंबर 2014

हर आने वाली सुबह है नया साल...

....
कारवां जीवन का चलता यूं
दिन ढलता, रात, फ़िर सुबह
झट उनींदी सी आँखें मलते 
समेटकर बिखरे-बिखरे बाल 
रोज़ जिस वक़्त जागते सब 
साड़ी के पल्लू से कमर कसे 
चल देती रचने एक अध्याय  
जीत लेती रोजमर्रा की जंग 
जारी है   ज़िन्दगी का सफर 
ख़ुशी से अपनी धुन में मस्त 
कुछ खट्टे कुछ मीठे से पल 
काव्य हो जाते शब्दों में ढल 
कभी कविता तो कभी नज़म 
हर दिन एक जीत सा जीवन
गुज़रा दिन बन जाता पिछला 
आने वाली सुबह है नया साल ...

शनिवार, 13 दिसंबर 2014

सम्मोहन ...

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अनंत सागर के
खारे पानी में
अकेली खड़ी वह 
हर क्षण धीरे-धीरे  
घुलती जा रही है 
सांसें रुकने को हैं, 
जैसे-जैसे डूबती है 
सागर की लहरों में
विश्वास और ढृढ़ होता
गहरे खींचता है उसे 
अभिमानी, उद्दंड
पर उसकी भी जिद्द है
जीत कर ही मानेगी
सागर की विशालता
जितना डराती हैं
उतना ही उसकी ओर 
खिंची चली जाती है 
उद्दात लहरें 
आवाज़ देती हैं उसे 
हर बार बहा ले जाती हैं 
बहुत कुछ उसका 
सब लाना है वापस उसे 
वह अच्छी तरह जानती है
यह प्रलय नही है 
सिर्फ सम्मोहन है 
कुछ-कुछ मृत्यु जैसा

गुरुवार, 4 दिसंबर 2014

बोलने लगते हैं चेहरे ....

...
मुखौटों के पीछे 
बरसो से मौन 
सहमे से बेजान
सिर्फ ढलते ही हैं 
जिनके सूरज    
एक ना एक दिन
झूठ से तंग आकर 
सच की सांस पाकर
खिल उठते हैं 
सुबह की धूप से   
और फिर हौले से 
बोलने लगते हैं चेहरे ...