शनिवार, 8 मार्च 2014

ना जाने कब....??


रसोई - घर- आंगन
खेत - खलिहान
चकरघिन्नी सी
फिरती रहती है
दिन भर वह
जीवन सहेजने की 
कोशिश में
खुद को निहारे
वर्षों बीत गए
तरुणाई की जगह
कब झुर्रियों ने ले ली
इस तेज़ दौड में
एहसास तक नहीं
उसके थके क़दमों को 
आराम की आस नहीं
आज भी खोजती है 
अपने अस्तित्व को सिर्फ
सिन्दूर, चूड़ी, महावर में
ना जाने कब कर सकेगी
अपने व्यक्तित्व का विस्तार
दे सकेगी बंधन से परे
अस्तित्व को सही आकार ......??

शनिवार, 1 मार्च 2014

अन्नदाता की पुकार ....

"इश्क, मोहब्बत, व्यापार हो या हो कोई सरकार  
पेट में जब तक पड़े न रोटी, सब कुछ है बेकार!!!"

असमय बारिश
आंधी तूफ़ान
रूठ गया क्यों
इनसे भगवान
जस का तस
इनका दर्द
बढ़ता जाता
क़र्ज़ का मर्ज़
गीली आखें
पोंछ रहा
चुपचाप खड़ा
देख रहा
पानी में मिलते
खून पसीने से सिंचे
खेत - खलिहान
हलाकान- परेशान
कोई है जो सुने.... ?
धरती का कर्ज चुकाते
कृषि-प्रधान देश के
इन किसानो की
दु:ख-भरी दास्तान ...!!!

सोमवार, 24 फ़रवरी 2014

छोटी सी अभिलाषा...


तुम .....
प्रकृति की अनुपम रचना
तुम्हारा विराट अस्तित्व
समाया है मेरे मन में
और मैं .....
रहना चाहती हूँ हरपल
रजनीगंधा से उठती
भीनी-भीनी महक सी
तुम्हारे चितवन में
चाहती हूँ सिर्फ इतना
कि मेरा हर सुख हो
तुम्हारी स्मृतियों में
और दुःख ........
केवल विस्मृतियों में................!

रविवार, 9 फ़रवरी 2014

वसंत.....

लेकर सरसों सी
सजीली धानी चूनर
समेट कर खुश्बुएं
सोंधी माटी की
पहन किरणों के
इंद्रधनुषी लिबास
आ जाओ वसंत
धरा के पास...

सजा सुकोमल
अल्हड़ नवपल्लवी
भर देना सुवास
बिखेरो रंग हजार
न रहने दो धरा को
देर तक उदास
आ जाओ वसंत
धरा के पास...

नवपल्‍ल्‍व फूटे
इतराई बालियां
सेमल, टेसू फूले 
अकुलाया मन
जगा महुआ सी
बौराई आस
आ जाओ वसंत
धरा के पास...

बोली कोयलिया
बौराए बौर आम के
भौरों की गूँज संग
कलियों का उछाह
बही बसंती बयार
लिए मद मधुमास
आ जाओ बसंत
धरा के पास...