न जाने कब से सोच रही हूँ
ऐसी जगह जाने की,
जहाँ जाते ही जगहें
मुझे गले लगाते हुए पूछें—
"इतने दिन कहाँ थी? कैसी है?"
जहाँ हर पेड़ मेरा नाम जानता हो,
हर पत्ता मेरे आने की ख़बर पंछियों को दे,
और हवा का झोंका बिना कुछ कहे
यूँ ही सर पर हाथ फेर दे।
जहाँ दरवाज़े मुझसे रूठें नहीं,
बल्कि खुलते ही मुस्कुरा उठें,
और देहरी पाँव रखते ही धीरे से कहे—
"बहुत दिन हुए, आई क्यों नहीं।"
जहाँ सुबह की धूप मेरी रज़ामंदी ले,
फिर आँगन में उतरे,
और शाम ढलते-ढलते
मेरे माथे पर चाँदनी का टीका लगा दे।
ऐसी जगह... शायद कोई गाँव हो,
कोई पहाड़, कोई नदी का किनारा,
या शायद कोई ऐसा घर,
जहाँ मैं ख़ुद को थका हुआ ना पाऊँ।
या फिर...
ऐसी जगह कोई और नहीं,
बस वो हो.....!
जिसकी आँखों में खोकर
मैं ख़ुद को फिर से पा लूँ।