शुक्रवार, 6 मार्च 2026

हर एक सफर की कहानी लिखो... संध्या शर्मा

हर एक सफर की कहानी लिखो,
दिल की धड़कनों की रवानी लिखो।

रास्तों में बिखरी है गुलों की महक,
बाद-ए-सबा की मेहरबानी लिखो।

कैसे मिलते हैं लोग कहीं दूर पर,
उस ताज़ा घड़ी की निशानी लिखो।

एक ख़त था जो अब बन गया दास्ताँ,
उस महबूब की सादा-जुबानी लिखो।

सोचती हूँ ये आँखें नम क्यों हुई,
उस दर्द की सच्ची बयानी लिखो।

रविवार, 22 फ़रवरी 2026

इक ऐसी जगह हो...!

 न जाने कब से सोच रही हूँ

ऐसी जगह जाने की,

जहाँ जाते ही जगहें

मुझे गले लगाते हुए पूछें—

"इतने दिन कहाँ थी? कैसी है?"


जहाँ हर पेड़ मेरा नाम जानता हो,

हर पत्ता मेरे आने की ख़बर पंछियों को दे,

और हवा का झोंका बिना कुछ कहे

यूँ ही सर पर हाथ फेर दे।


जहाँ दरवाज़े मुझसे रूठें नहीं,

बल्कि खुलते ही मुस्कुरा उठें,

और देहरी पाँव रखते ही धीरे से कहे—

"बहुत दिन हुए, आई क्यों नहीं।"


जहाँ सुबह की धूप मेरी रज़ामंदी ले,

फिर आँगन में उतरे,

और शाम ढलते-ढलते

मेरे माथे पर चाँदनी का टीका लगा दे।


ऐसी जगह... शायद कोई गाँव हो,

कोई पहाड़, कोई नदी का किनारा,

या शायद कोई ऐसा घर,

जहाँ मैं ख़ुद को थका हुआ ना पाऊँ।


या फिर...

ऐसी जगह कोई और नहीं,

बस वो हो.....!

जिसकी आँखों में खोकर

मैं ख़ुद को फिर से पा लूँ।