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रविवार, 22 फ़रवरी 2026

इक ऐसी जगह हो...!

 न जाने कब से सोच रही हूँ

ऐसी जगह जाने की,

जहाँ जाते ही जगहें

मुझे गले लगाते हुए पूछें—

"इतने दिन कहाँ थी? कैसी है?"


जहाँ हर पेड़ मेरा नाम जानता हो,

हर पत्ता मेरे आने की ख़बर पंछियों को दे,

और हवा का झोंका बिना कुछ कहे

यूँ ही सर पर हाथ फेर दे।


जहाँ दरवाज़े मुझसे रूठें नहीं,

बल्कि खुलते ही मुस्कुरा उठें,

और देहरी पाँव रखते ही धीरे से कहे—

"बहुत दिन हुए, आई क्यों नहीं।"


जहाँ सुबह की धूप मेरी रज़ामंदी ले,

फिर आँगन में उतरे,

और शाम ढलते-ढलते

मेरे माथे पर चाँदनी का टीका लगा दे।


ऐसी जगह... शायद कोई गाँव हो,

कोई पहाड़, कोई नदी का किनारा,

या शायद कोई ऐसा घर,

जहाँ मैं ख़ुद को थका हुआ ना पाऊँ।


या फिर...

ऐसी जगह कोई और नहीं,

बस वो हो.....!

जिसकी आँखों में खोकर

मैं ख़ुद को फिर से पा लूँ।

बुधवार, 5 जून 2024

हरियाली खुशहाली है... संध्या शर्मा

बच्चों आओ मैं हूँ पेड़

मुझे लगाओ करो ना देर

जब तुम मुझे उगाओगे 

धरती सुखी बनाओगे

दुनिया मेरी निराली है

हरियाली खुशहाली है


रोको मुझपर होते प्रहार

मैं हूँ जीवन का आधार

छाँव फूल फल देता हूँ

तुमसे कुछ नही लेता हूँ

वायू जहरीली पीता हूँ

शुद्ध हवा तुम्हें देता हूँ


प्रकृति का सम्मान करो

वसुंधरा का तुम ध्यान धरो

मेरा मन भी बहुत रोता है

दुख मुझको भी होता है

अब तो मुझको ना काटो

टुकड़ों टुकड़ों में ना बांटो 


मुझसे ही बनते हैं उपवन

मैं हूँ, तो जीवित हैं ये वन

देता हूँ पंछी को ठिकाना

और चिड़ियों को दाना

रूठी प्रकृति को मनाना

कहते थे ये दादा नाना

बात उनकी तुम मानोगे

घर - घर पेड़ लगाओगे