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रविवार, 22 फ़रवरी 2026

इक ऐसी जगह हो...!

 न जाने कब से सोच रही हूँ

ऐसी जगह जाने की,

जहाँ जाते ही जगहें

मुझे गले लगाते हुए पूछें—

"इतने दिन कहाँ थी? कैसी है?"


जहाँ हर पेड़ मेरा नाम जानता हो,

हर पत्ता मेरे आने की ख़बर पंछियों को दे,

और हवा का झोंका बिना कुछ कहे

यूँ ही सर पर हाथ फेर दे।


जहाँ दरवाज़े मुझसे रूठें नहीं,

बल्कि खुलते ही मुस्कुरा उठें,

और देहरी पाँव रखते ही धीरे से कहे—

"बहुत दिन हुए, आई क्यों नहीं।"


जहाँ सुबह की धूप मेरी रज़ामंदी ले,

फिर आँगन में उतरे,

और शाम ढलते-ढलते

मेरे माथे पर चाँदनी का टीका लगा दे।


ऐसी जगह... शायद कोई गाँव हो,

कोई पहाड़, कोई नदी का किनारा,

या शायद कोई ऐसा घर,

जहाँ मैं ख़ुद को थका हुआ ना पाऊँ।


या फिर...

ऐसी जगह कोई और नहीं,

बस वो हो.....!

जिसकी आँखों में खोकर

मैं ख़ुद को फिर से पा लूँ।

सोमवार, 21 अक्टूबर 2013

आ जाओ चाँद... संध्या शर्मा

उषा की लाली संग 
अंगना रंगोली सजाकर 
घर का कोना -कोना 
स्नेह से महकाकर 
रसोई के सारे काम 
जल्दी से निबटाकर 
सोलह सिंगार कर
अक्षत, चन्दन, फूल
केसर, कुमकुम से 
भरी थाल सजाकर
संध्या की मधुर बेला 
पुकारूंगी तुम्हे चाँद
जब पलकें बिछाए 
करुँगी साथ उनके 
तुम्हारा भी इंतजार 
बादलों  की ओट में 
चुपके से छिप जाओगे   
लजाओगे शरमाओगे 
कुछ पल  सताओगे 
तुम भी जानते हो 
मेरे का मन का हाल  
क्योंकि उनकी तरह
तुम्हे भी है मेरा ख्याल
लेकिन जानती हूँ मैं
हौले से मुस्कुराकर 
आ ही जाओगे तुम ....
 
 सौभाग्य और ऐश्वर्य के पर्व 'करवा चौथ' की हार्दिक शुभकामनाएं ....

शुक्रवार, 26 जुलाई 2013

बरसे छंद घनघोर...संध्या शर्मा

मुझे क्या...?
 कब मेघ छाये
कब बरखा बरसे
चाहे यक्ष-प्रिया
मेघदूत को तरसे
मैं तो बरखा तब जानूं
जब भावमेघ कालिदास के
 उमड़-घुमड़ छाएं
शब्दों की अमृत बूंदें
झूम-झूम बरसे
भर जाये ताल-तलैया
मनभावन रागों की
गीत-ग़ज़ल की
निर्मल सरिता बहे
हरषे जियरा
नाचे मन मोर
लिख दो हरियाली
चहुँ ओर
गाऊं होकर
प्रेम विभोर
छंद कालिदास के
बरसे घनघोर...

शुक्रवार, 24 मई 2013

बनो अग्रदूत..... संध्या शर्मा

चाहते हो ???
बगुलों के बीच

नीर-क्षीर विवेकी हंस होना
ग्रहों से परिक्रमित होते
प्रकाशित करते
सौरमन्डल के सूर्य की तरह
प्रतिपल चमकना
तो भेड़ प्रवृत्ति से प्रथक
जनसमूह का बनकर घटक
अनुगंता, अनुकर्ता  नहीं
अग्रदूत बनो
अस्तित्व को नई पहचान दो
आसान न सही
असंभव भी नहीं  
आकाश के अगणित तारों के मध्य
ध्रुवतारा होना....

मंगलवार, 26 मार्च 2013

होली... संध्या शर्मा

होली के रंग आपके जीवन को नए हर्ष और उल्लास से भर दें. होली की बहुत-बहुत बधाई और ढेर सारी शुभकामनायें ....
(होली खेलें लेकिन जीवन दायिनी अमृत रुपी
जल की हर बूंद का महत्त्व समझें) 




मुट्ठी में रंग
मन में उमंग
कान्हा का प्यार
भीजे सिंगार 
मुरली की तान
ग्वालों का गान
मोहे सुन बावरिया होवन दे,
कान्हा संग होली खेलन दे... 

नीरज फुहार
आनंद अपार
उड़े अबीर गुलाल
अवनि आकाश लाल
गुंजन की माल
मयूर पंख भाल
मोहे श्याम रंग में रंगने दे,
कान्हा संग होली खेलन दे... 

देखो धूम मची
गोपियाँ नाच उठी 
रंगों की कली
खिली गली-गली
फैली सुगंध
बोले बाजूबंद
मोहे रंग केसर को घोलन दे,
कान्हा संग होली खेलन दे...

रविवार, 17 मार्च 2013

पहचान... संध्या शर्मा

मेरी ही आँखें
मेरे ही अक्स को
घूरती हैं
अनजान की तरह
वो कुछ शब्द
जो यकीं दिलाते
मुझे मेरे होने का
क्यों नहीं बोलती
कितना मुश्किल है
इनकी ख़ामोशी तोडना
तुम कहते हो
आसान है सब
सच कहूँ....
कुछ भी अजीब नहीं लगता
आदत सी हो गई है
कर भी क्या सकती हूँ
फिर भी कोशिश में हूँ
अपनी ही आँखों में
अपनी पहचान ढूंढ़ने की
याद दिला सकूँ
कौन हूँ ??
जानती हूँ
बदल गई हूँ ....

शनिवार, 9 मार्च 2013

अंतरात्मा... संध्या शर्मा

(1)
 
तू...
चली गई
अच्छा ही हुआ 
रहती तो 
दिल धडकता 
अन्याय के 
विरोध में 
कभी तो 
भड़कता
 
(2)
 
अब
सबकी 
सुनती हूँ 
दबा सकती हूँ 
आवाज़ मन की 
तू होती तो 
हारती 
रोज तुझसे 
तेरा क़र्ज़ 
मैं चुकाती 
 
(3)
 
देख 
कैसी निर्लज्ज हूँ 
तू नहीं है 
फिर भी
बचा रखी हैं 
कुछ साँसे 
बिन तेरे भी 
जीने के लिए 
इस शरीर को 
देती हूँ रोज
थोड़ी-थोड़ी

बुधवार, 6 फ़रवरी 2013

अतीत में जीना बुरा होता है... संध्या शर्मा

पारदर्शी लक्ष्मण रेखा  
विरासत में मिली
जो रोक देती 

मेरे तुम तक
बढ़ते कदम
मेरे पाँव मुझसे
नज़दीकियों की
मांग करते 

जिसकी तलाश में
गुजरते रात -दिन
गुम कर दिया
मैंने अपना पता
अपने हाथों से
इसी दुनिया में रहते 

नई दुनिया तराश डाली
अब मेरे मन के
दो पाँव हो गए 

एक पाँव....
अतीत का साथ देता है
दूजा कहता है....
अतीत में जीना बुरा होता है....    

मंगलवार, 29 जनवरी 2013

पहरा.... संध्या शर्मा

बावली है... 
आजकल उसे
चंदामामा, बिल्ली मौसी,
चिड़िया रानी, परियों के
सपने नहीं आते
उनकी जगह
सियार, भेड़िये,सांप
धुंए के उड़ते हुए
बवंडरों ने ले ली है 
बहुत कोशिश की उसने
लेकिन इन्हें बदल ना सकी 

धीरे - धीरे समझने लगी है
सोते जागते हर पल
उसके देह और मन पर 
जीवन भर.........!

अदृश्य नज़रों का पहरा है
सपनो पर भी....

शनिवार, 12 जनवरी 2013

रोक सकोगे???... संध्या शर्मा

मेरे भीतर
आक्रोश की
उफनती
लहराती
फुंफकारती
धधकती
विकराल 
नदी है
रोक सकोगे???
सुना है
तुम...
समंदर हो

बुधवार, 2 जनवरी 2013

मुक्ति... संध्या शर्मा

मुक्त करती हूँ तुम्हे 
हर उस बंधन से 
जो बुने थे 
सिर्फ और सिर्फ मैंने 
शायद उसमे 
ना तुम बंध सके 
ना मैं बाँध सकी 
निकल जाना है  
अलग राह पर 
लेकर अपने 
सपनो की गठरी 
जिसे सौपना था तुम्हे 
खोलना था बैठकर 
तुम्हारे सामने 
लेकिन अब नहीं...!
क्योंकि जानती हूँ 
गठरी खुलते ही 
बिखर जायेंगे 
मेरे सारे सपने 
कैसे समेटूंगी भला 
दोबारा इनको 
और हाँ...! 
इतनी सामर्थ्य नहीं मुझमे 
कि समेट सकूँ इन्हें 
इसीलिए ...
कसकर बांध दिया है 
मैंने उन गाठों को 
जो ढीली पड़ गईं थी
मुझसे अनजाने में 
अच्छा अब चलती हूँ 
अकेले जीना चाहती हूँ 
बची - खुची साँसों को 
हो सकता है...?
तुम्हे मुक्त करके 
मैं भी मुक्ति पा जाऊं....

सोमवार, 31 दिसंबर 2012

सूर्योदय होगा...संध्या शर्मा

जानती हूँ मैं
जो भी घटा
पहली बार नहीं
सदियाँ हो गई घटते
ज़ुल्म सहते-सहते
फिर भी आशान्वित हूँ
विपरीत परिस्थितियों में
यातनाओं से डरी नहीं हूँ
बहुत खुश हूँ आज
चिंगारी एक सुलगती दिखी है
हजारो युवा आँखों में मुझे
यही चिंगारी...

एक किरण बनेगी
हर साल की तरह
इस साल की सुबह 

अँधेरा नहीं लाएगी
एक किरण जगमगाएगी
आशा जाग उठी है
कल दूर अँधेरा होगा
नया सूर्योदय होगा...

शनिवार, 29 दिसंबर 2012

प्रीतनिया.... संध्या शर्मा

 
गीत नया क्या गाऊं साथी
छेड़ूँ क्या वीणा पर तान
क्रंदन उर की हर धडकन में
पीड़ा होती प्रबल महान

 
छूटी लय,ताल बिखरी है 
बिसरा सकल सुरों का भान
मेरे मन के राग राग से
कैसे हो अबतक अनजान

उपमाएं तुम ही मेरी हो
तुम ही मेरे हो उपमान
तुम बिन कैसे मैं पर खोलूं
तुम बिन कैसे भरूं उड़ान
 
तुम उषा की स्वर्णिम आभा
तुम बिन मैं दिवस की सांझ
बेकल मन क्यों तुमको चाहे
क्यों तुममे बसते हैं प्राण

हिरण्यगर्भ सुरभित सुमन
निसदिन संचित नेह सुजान
सुर ताल लय मृदंग किंकणी
तेरी बाट तके है नित मान

शुक्रवार, 14 दिसंबर 2012

एक बूँद ज़िन्दगी... संध्या शर्मा


एक आंधी का इंतज़ार है 
एक तूफ़ान की ख्वाहिश है
झुकी आँखें राह तकती हैं
धुंध है, ओस बिखरी सी है
आँखों में कुछ नमीं सी है
बीते पल की भीनी खुशबू
पलकों पर बूँद बनकर
आज थमी - थमी सी है
वक़्त ने सिफारिश की है
ख़ुशी हासिल करने की
एक आजमाइश सी है
दो बूँद भी तो काफी हैं
एक जिंदगी के लिए
एक तुम बरसा दो
एक मैं छलका दूँ ....

मंगलवार, 11 दिसंबर 2012

ये जीवन है???... संध्या शर्मा




हर रोज बैठे रहते हैं अकेले
कभी टी वी के निर्जीव चित्र देखते
कभी मोटे चश्मे से अखबार छानते
एक वक़्त था कि फुर्सत ही न थी
एक पल उसकी बातें सुनने की
आज कितनी याद आती है वह
वही सब मन ही मन दोहराते
बीच-बीच में नाती से कुछ कहते
क्या कहा कोई सुनता नहीं
अभी - अभी बहु ने गुस्से से
ऐसे पटकी चाय की प्याली
फूटी क्यों नहीं वही जानती होगी
बेटों ने ऐसे कटाक्ष किये कि
जख्मों पर नमक पड़ गया 
तन-मन में सुलगती आग
फिर भी गूंजी एक आवाज़
"बेटा शाम को घर कब आएगा"
ठण्ड से कांपता बूढ़ा शरीर
सिहर उठता है रह-रह कर
अपनी ही आँखों के आगे 
अपने शब्द और अस्तित्व
दोनों को  धूं -धूं करके

गुर्सी की आग में जलते देख
जो उड़कर बिखर रहे हैं 
वक़्त क़ी निर्मम आंधी में
कागज़ के टुकड़ों क़ी तरह...

बुधवार, 7 नवंबर 2012

मेरे कालिदास...संध्या शर्मा

हर बार..........
जब भी कुछ लिखने बैठती हूँ
बहुत कोशिश करती हूँ
तुमको ना लिखूं
फिर भी आ ही जाते हो
तुम कहीं ना कहीं से
तुम्हारे आते ही
छाने लगते है
भावों के मेघ
बरसने लगती हैं,
सुन्दर शीतल
शब्दों की बूँदें
धीरे से इनमे समाकर
दे जाते हो मेरे सूखे शब्दों को
हरियाला सावन 
मेरे जीवन के  मेघदूत
मेरे कालिदास...

गुरुवार, 11 अक्टूबर 2012

जीवन संध्या....संध्या शर्मा

सुबह से शाम
चलते-चलते
थक गया तन
सुनते-सुनते
ऊबा मन
आँखें नम
निर्जन आस
भग्न अंतर
उद्वेलित श्वास
बहुत उदास
कुछ निराश
शब्द-शब्द
रूठ रहे हैं
मन प्राण
छूट रहे हैं
पराया था
अपना है
कभी लगता
सपना है
सूरज जैसे
अस्त हो चला
अंतिम छंद
गढ़ चला.................!

शुक्रवार, 14 सितंबर 2012

खौफ़.... संध्या शर्मा

रात काफी हो गई है 
कितना वक़्त हो गया
सो जाना था अब तक मुझे
नींद है कि आने का नाम नहीं लेती
कवि हूँ, क्या नहीं कर सकती
कहाँ नहीं जा सकती
मन कहता है कहीं घूम आऊं
कहाँ जाऊं
रात है
गहरी काली रात
और लिख रही हूँ मैं
बिना किसी भय के
अचानक यह आवाज़ कैसी?
शायद ट्रकों के आपस में टकराने की आवाज़
भ्रम नहीं है यह ना कोई सपना
यथार्थ है
पहुँच गया मन मेरा वहां
ओह... कितना भयानक दृश्य
बिखरी हुई लाशें
बहता हुआ गरम खून
भिनभिनाते हुए मच्छर
और कोई भी नहीं
देखना....
कल कुछ नहीं होगा यहाँ
हाँ एक खबर जरुर बन जाएगी
छाप जाएगी अखबारों में
और मैं....
मैं अब भी जागूंगी
इस आह्ट के खौफ़ से........

सोमवार, 10 सितंबर 2012

कोई आया भी तो......संध्या शर्मा

जब बीत गया सावन  
घिरकर क्या करेंगे घन
सूखे मन के उपवन में
कोई आया भी तो क्या आया

ख़ुशी बसंती बयार हो
कोयल गीत गाती हो
बसंती राग पतझर ने
कोई गाया भी तो क्या गाया

लगी हो आग सावन में
तन-मन झुलसा हो
जल रहा गीत जब हो
कोई मल्हार गाया तो क्या गाया
                                                                                     
खुली रखीं प्रतीक्षा में
जाने कब से ये आँखें
थककर मूँद ली पलकें
कोई आया भी तो क्या आया

तड़पकर बूँद को जिसकी
प्यासा मर गया चातक
सजल घन मौत पर उसकी
कोई रोया भी तो क्या रोया

जीवन भर उजाले को
भटकती रही व्याकुल
जलाकर दीप समाधि पर
कोई लाया भी तो क्या लाया