और तुम
ले जा रहे हो मुझे सागर में
मुझे प्यास नहीं कोई चाह नहीं
हाँ डर है...!
कहीं सागर निगल न ले
मेरे अस्तित्व को
ध्यान से देखो मुझे मैं तो पत्थर हूँ
और तुम
ले जा रहे हो मुझे हिमशिखर पर
पारस बनने की चाह नहीं
हाँ डर है
कहीं पिघल ना जाऊं
मोम बनकर...!
मैं तो एक बूँद हूँ, नन्ही सी ओस की
और तुम
बनाना चाहते हो बदली
नहीं घिरना चाहती झूमकर
हाँ डर है
कहीं बरस ना जाऊं
और समा जाऊं धरती में हमेशा के लिए...!
