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मेरी कविताएं
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सोमवार, 24 फ़रवरी 2014
छोटी सी अभिलाषा...
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तुम ..... प्रकृति की अनुपम रचना तुम्हारा विराट अस्तित्व समाया है मेरे मन में और मैं ..... रहना चाहती हूँ हरपल रजनीगंधा से उठती भी...
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रविवार, 9 फ़रवरी 2014
वसंत.....
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लेकर सरसों सी सजीली धानी चूनर समेट कर खुश्बुएं सोंधी माटी की पहन किरणों के इंद्रधनुषी लिबास आ जाओ वसंत धरा के पास... सजा सुकोमल अल्हड़ नवप...
13 टिप्पणियां:
मंगलवार, 21 जनवरी 2014
मंज़िल की ज़ानिब....
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लम्हा नहीं थी एक मैं जहान में सदा रही हूँ, ख़यालों में रहे हमेशा मैं तुमसे जुदा नही हूँ. किस्से गढे इस जीस्त-ए-सफ़र ने हजारों बार ,...
11 टिप्पणियां:
शनिवार, 11 जनवरी 2014
अंतिम छोर...
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प्रायवेट वार्ड नं. ३ जिन्दगी/मौत के मध्य जूझती संघर्ष करती गूंज रहे हैं तो केवल गीत जो उसने रचे जा पहुंची हो जैसे सूनी बर्फीली वादियों...
15 टिप्पणियां:
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