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मेरी कविताएं
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रविवार, 22 फ़रवरी 2015
अपनो छोटो सो घरगूला.....
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हिराने अंगना बिसरे चूल्हा कहाँ डरे अब बरा पे झूला भूले चकिया सूपा, फुकनी नहीं दिखे ढिग छुई की चिकनी ओझल भये गेरू के फूल गाँव गलिन की गुईय...
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सोमवार, 16 फ़रवरी 2015
कहाँ गए तुम्हारे सामुद्रिक संस्कार???
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..... हे उद्दात लहरों ... कौन भड़काता है तुम्हे कौन सिखाता है तुम्हे क्यों ठेस पहुंचाती हो क्यों ख़ुदको छलती हो क्या यही सभ्...
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सोमवार, 2 फ़रवरी 2015
आंखर चाय...
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शब्दों की भीनी मिठास भावों की महक को जब शृंगार के जल में व्याकरणी दूध खौलाकर डबकाते होगें कुछ देर तो कविता सी ...
9 टिप्पणियां:
मंगलवार, 27 जनवरी 2015
पुरानी ज़िद...
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अक्षर अक्षर शब्द मेरे जानती नहीं कब हो गए भाव तुम्हारे इस सफ़र का पता ही न चला करने लगे हो मेरे ही मन में खू...
9 टिप्पणियां:
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