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मेरी कविताएं
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बुधवार, 31 दिसंबर 2014
हर आने वाली सुबह है नया साल...
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.... कारवां जीवन का चलता यूं दिन ढलता, रात, फ़िर सुबह झट उनींदी सी आँखें मलते समेटकर बिखरे-बिखरे बाल रोज़ जिस वक़्त जागते सब ...
16 टिप्पणियां:
शनिवार, 13 दिसंबर 2014
सम्मोहन ...
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.... अनंत सागर के खारे पानी में अकेली खड़ी वह हर क्षण धीरे-धीरे घुलती जा रही है सांसें रुकने को हैं, जैसे-जैसे डूबती...
9 टिप्पणियां:
गुरुवार, 4 दिसंबर 2014
बोलने लगते हैं चेहरे ....
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... मुखौटों के पीछे बरसो से मौन सहमे से बेजान सिर्फ ढलते ही हैं जिनके सूरज एक ना एक दिन झूठ से तंग आकर सच की सां...
5 टिप्पणियां:
मंगलवार, 18 नवंबर 2014
माँ.... !
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पंछी गूंगे हो गए चाँद-तारे खो गए जहाँ तक नज़र जाए ठूँठे से दरख़्त है मेरे बचपन का गाँव ज्यूँ काठ का हो गया जबसे आखि...
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