पेज
(यहां ले जाएं ...)
मुखपृष्ठ
मेरी कविताएं
▼
बुधवार, 31 जुलाई 2013
सखी री! गुनगुनाऊँ, गीत एक गाऊँ...संध्या शर्मा
›
सखी री! गुनगुनाऊँ, गीत एक गाऊँ अपनो के मेले मे, कभी अकेले में, एक पल मुस्कुराऊँ, गीत एक गाऊँ सखी री! गुनगुनाऊँ, गीत एक गाऊँ बरखा...
24 टिप्पणियां:
शुक्रवार, 26 जुलाई 2013
बरसे छंद घनघोर...संध्या शर्मा
›
मुझे क्या...? कब मेघ छाये कब बरखा बरसे चाहे यक्ष-प्रिया मेघदूत को तरसे मैं तो बरखा तब जानूं जब भावमेघ कालिदास के उमड़-घुमड़ छाएं शब्दों की...
26 टिप्पणियां:
सोमवार, 24 जून 2013
स्थायित्व पाना है...?... संध्या शर्मा
›
"बीत गई सो बात गई" भरोसा न करना इस कथनी पर सिर्फ धोखा है भूतकाल निश्चित वर्तमान अनिश्चित भविष्य में क्या होगा न तुम जानो न हम ...
22 टिप्पणियां:
गुरुवार, 6 जून 2013
व्याकुल पीड़ा ... संध्या शर्मा
›
.... कांक्रीट के जंगल में अकेला खड़ा वटवृक्ष भयभीत है...? व्याकुल है आज चौंक उठता है हर आहट से जबकि जोड़ रखे हैं कितने रिश्ते - नाते सां...
27 टिप्पणियां:
‹
›
मुख्यपृष्ठ
वेब वर्शन देखें