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सोमवार, 23 अगस्त 2021

कजलियां-छोटन ने दई, बड़न ने लई, बारन के कानन में खोंस दई

कजलियां प्रकृति प्रेम और खुशहाली से जुड़ा पर्व है। इसका प्रचलन सदियों से चला आ रहा है। राखी पर्व के दूसरे दिन कजलियां पर्व मनाया जाता है। इसे कई स्थानों पर भुजलिया या भुजरियां नाम से भी जाना जाता है। श्रावण मास की अष्टमी और नवमीं तिथि को बांस की छोटी-छोटी टोकरियों में खेतों से लाई मिट्टी की तह बिछाकर गेहूं के दाने बोए जाते हैं।

 गेहूं की फसल बोने से पहले मनाए जाने वाले इस पर्व पर मिट्टी की उर्वरक शक्ति तथा बीजों की अंकुरण क्षमता परखी जाती है। अलग-अलग खेतों से लाई गई मिट्टी में घर में रखे गेहूं के बीज को बोया जाता है।

इससे जब कजलियां तैयार होती है तो किसानों की इस बात का अंदाजा लग जाता है कि खेत की मिट्टी और गेहूं का बीज कैसा है। यदि कजलिया मानक के अनरुप पाई गई तो किसान आश्वस्त हो जाते हैं कि बीज और खेत की मिट्टी गेहूं की फसल के लिए उपयुक्त है।

यह पर्व अच्छी बारिश, अच्छी फसल और जीवन में सुख-समृद्धि की कामना से किया जाता है। तकरीबन एक सप्ताह में गेहूं के पौधे उग आते हैं, जिन्हें भुजरिया कहा जाता है। 

श्रावण मास की पूर्णिमा तक ये भुजरिया चार से छह इंच की हो जाती हैं। कजलियों (भुजरियां) के दिन महिलाएं पारंपरिक गीत गाते हुए और गाजे-बाजे के साथ तट या सरोवरों में कजलियां विसर्जन के लिए ले जाती हैं।

तालाबों और तटों पर कजलियां खोंट ली जाती हैं और बची टोकरियों का विसर्जन कर कजलियां पर्व मनाया जाता  है।

हरी-पीली व कोमल गेहूं की बालियों को आदर और सम्मान के साथ भेंट करने एवं कानों में लगाने की परंपरा सदियों से चली आ रही है। 

तालाबों व तटों पर कजलियां विसर्जन का मेला लगता है। 

चारों ओर खरीददारी के लिए दुकानें सजती हैं।

सभी एक दूसरे की सुख - समृद्घि की कामना कर पुराने राग - बैर को भूलने का संकल्प करते हैं।

मेल मिलाप के इस पर्व पर लोग एक दूसरे को कजलियों का आदान प्रदान करते  हैं। जो बराबरी के हैं, वे गले लगते हैं और जो बड़े हैं वे छोटों को आशीर्वाद देते हैं। बच्चों के कान में स्नेह और आशीष स्वरुप कजलियां खोंस दी जाती है। 

कजलियों को लेकर बच्चों में खासा उत्साह देखने मिलता है। बच्चों को कजलियां देने के बाद शगुन के रूप में बड़े उन्हें उपहार देते हैं। लोग सुख - दुख बांटने, मेल-मिलाप के लिए नाते-रिश्तेदार एक दूसरे के घर जाते  हैं।

 
मान्यतानुसार इसका प्रचलन राजा आल्हा ऊदल के समय से है। 
 
इस पर्व की प्रचलित जानकारी के अनुसार आल्हा की बहन चंदा श्रावण माह में ससुराल से मायके आई तो सारे नगरवासियों ने कजलियों से उनका स्वागत किया था। महोबा के सिंह सपूतों आल्हा-ऊदल-मलखान की वीरगाथाएं आज भी बुंदेलखंड में गाई जाती है।

कहते है कि महोबा के राजा परमाल की बेटी राजकुमारी चन्द्रावलि का अपहरण करने के लिए दिल्ली के राजा पृथ्वीराज ने महोबा पर चढ़ाई कर दी थी।
 
उस समय राजकुमारी तालाब में कजली सिराने अपनी सखियों के साथ गई हुई थी। राजकुमारी को पृथ्वीराज से बचाने के लिए राज्य के वीर महोबा के वीर सपूतों आल्हा-ऊदल-मलखान ने वीरतापूर्ण पराक्रम दिखाया था।  इन दो वीरों के साथ में चन्द्रावलि के ममेरे भाई अभई भी उरई से जा पहुंचें। कीरत सागर ताल के पास हुई लड़ाई में अभई को वीरगति प्राप्त हुई। उसमें राजा परमाल का बेटा रंजीत भी शहीद हो गया।
 
बाद में आल्हा-ऊदल, और राजा परमाल के पुत्र ने बड़ी वीरता से पृथ्वीराज की सेना को हराया और वहां से भागने पर मजबूर कर भगा दिया। महोबे की जीत के बाद पूरे बुन्देलखंड में कजलियां का त्योहार मनाया जाने लगा।  

छोटन ने दई,    बड़न ने लई
बारन के कानन में खोंस दई

कजलियां महापर्व की हार्दिक - हार्दिक मंगलकामनाएं